Sunday, 18 December 2016

आधुनिक भारत का तुगलक - भाग 1


भारत सरकार ने एक  दिन रात के 8  बजे घोषणा करके देश में चलने वाले 500 और 1,000 के नोट को अमान्य घोषित कर दिया ... अब यह फैसला कितने दिल और दिमाग से लिया गया है इसका फैसला वक़्त ही बताएगा , पर इस फैसले ने देश में जो हालात पैदा किये है , उसकी सही तस्वीर देखने और समझने के लिए हमें अपने आप से पूछना पड़ेगा की जो हुआ और जैसे हुआ क्या उससे बेहतर हो सकता था ? खैर  नोटबंदी की इस घटना को मैंने  अपने नज़रिये  से देखा और परखा ...इसी दौरान हुए अनुभव ने मुझे भारत के इतिहास और साहित्य की कुछ घटनाओं और कथाओं को मेरे ज़ेहन  में फिर से जिन्दा कर दिया ... हम इस नोटबंदी को भारत के इतिहास में हुई कुछ ऐसी घटना से तुलना करके देखते है , साथ ही इस से उपजी सामाजिक व्यवस्था  और लोगों की सोच और उनकी प्रतिक्रिया  को कथा के माध्यम से परखते और समझते है ...

कहने को भारत सरकार अपने फैसले को कालाधन , नकली नोट  भ्रष्टाचार और देश की सुरक्षा के लिए लिया गया फैसला बताती है , हो सकता है भारत सरकार ने इसी सोच को ध्यान में रख यह कड़ा  फैसला लिया हो , पर यह फैसला भारत के इतिहास में दर्ज मोहम्मद बिन तुगलक की याद दिलाने के लिए काफी है , जिसने अपनी गहन सोच और राजनितिक सूझ बुझ के चलते , देश में चमड़े के सिक्के चलाये और फिर उसका परिणाम क्या हुआ , यह इतिहास में दर्ज़  है , इतना ही नहीं उसने अपनी राजनितिक चतुराई का भरपूर इस्तमाल करते हुए , भारत की राजधानी दिल्ली को दौलताबाद शिफ्ट किया और उसके बाद जो देश में अफ़रातफ़री का माहौल  बना उसका परिणाम भी इतिहास में दर्ज़ है ..मोहम्मद तुगलक ने अपने फैसलों को उस वक़्त देश और जनहित में लिया गया एक कड़ा  कदम बताया , पर इतिहास बताता है की उसका फैसला कितनी समझ बूझ और परिपक्वता  से पूर्ण था ....आज भारत अपने उसी इतिहास को फिर से दोहराता लगता है ...एक  चलती फिरती , उभरती अर्थवयवस्था में ..इसी सोच और समझ बुझ से कितना बड़ा ब्रेक लगा है और उसके क्या दूरगामी परिणाम होंगे यह भारत के इतिहास में अवश्य लिखा जाएगा ...

सिर्फ अपनी जिद्द  , झूठी शोहरत  और चाटुकारों से घिरे  भारत के बादशाह ने आज फिर तुगलक को अपना अघोषित गुरु बना लिया है ....

मोहम्मद बिन तुगलक ने जो किया और उसके बाद इस देश की जनता ने जो कड़वे  घुट पिए ...वह एक  अलग तस्वीर है ...पर यही जनता कितनी मासूम है इसे हम एक  और नज़रिये  से देखे और समझेंगें  ...आजकल मीडिया में लोगो का इंटरव्यू बड़ी शिद्दत से दिखाया जाता है , की लोग बैंक के आगे खड़े होकर अपने ही पैसे के लिए भीख मांगते हुए भी बड़ी शान और फक्र से कहते है , बहुत ही अच्छा फैसला है , जबकि सच्चाई यह है , यह वही लोग है , जो कभी राशन की लाइन में खड़े होने पर  स्यापा करते थे और काला बाज़ारियों को दिन रात कोसते थे ,पर मौका लगते ही राशन का सामान बाजार में बेच देते थे , यह वही लोग है जो ड्राइविंग लाइसेंस बनाने के लिए अंडर टेबल से काम चलाते है और इनमें से कितनो ने सही में ड्राइविंग टेस्ट दिया है , यह वही लोग है जो , जरा सी ट्रैफिक लाइट पर  खड़े होने पर गुस्से से लाल पीले हो जाते है और मौका देख लाल बत्ती धड़ल्ले से पार कर जाते है ....यह वही लोग है जो सडक दुर्घटना में तडपते हुए लोगों को सिर्फ इसलिए नहीं उठाते की कहीं  इनका महत्वपूर्ण समय बर्बाद ना हो जाए , यह वही लोग है जिनके सामने किसी की इज्जत लूटी जाती है और अपनी आंख फेर कर निकल जाते है , यह वही लोग है जो लाइन में खड़े होने जैसे संस्कारों से अछूते है ....पर आज बैंक के आगे खड़े होकर छाती ठोंक कर फक्र महसूस करते है ..

इस सन्दर्भ में इक कहानी याद आती है ...एक  मुर्ख किस्म का राजा था , जो अपनी जिद्द  , अजीबों गरीब शौक और अपने ऊल ज़लूल  फैसलों के लिए प्रसिद्ध था , एक  बार एक  शातिर और धूर्त किस्म का आदमी उसके दरबार में आया , उसके मन में राजा को लेकर एक  दबा हुआ विद्रोह था , उसने राजा को बेवकूफ बनाने और ठगने के लिए एक  स्वांग रचा ..वह राजा के दरबार में गया उसकी झूठी प्रसंशा में उसने बड़े बड़े कसीदे गढ़े , राजा अपनी शान , यश और चतुराई की झूठी प्रसंशा से फुला  ना समाया , जब राजा उस व्यक्ति के वाक्य जाल में उलझ गया तो उसने , एक  जालीनुमा चादर राजा को भेंट किया और बोला महाराज ,यह एक दैविक  चादर है , इस चादर की खूबी है , जो भी नंगा इन्सान इसे अपने ऊपर लपेट लेता है , वह दुनिया के विद्वान और समझदार इन्सान को नंगा दिखलाई नहीं देता ....अगर किसी को वह नंगा दिखलाई देता है इसका मतलब वह इन्सान मुर्ख और देशद्रोही है ....राजा के चतुर दिमाग में एक  विचार कोंध उसने सोचा क्यों ने इसे ओढ़ कर देखा जाए , की मेरे दरबार में कितने लोग विद्वान और कितने मुर्ख है ....उसने झटपट अपने सब कपड़े उतारे और उस व्यक्ति के द्वारा लाइ हुई जालीदार चादर ओढ़ ली ...

राजा ने जब चादर ओढ़ कर खुद को आईने के आगे देखा तो उसे अपने आपको नंगा देख कर बड़ी ज़िल्लत और शर्म महसूस हुई , पर अपनी झूठी आन , बान शान और विद्वान होने भ्रम ने उसकी आँखों पर पट्टी बाँध दी और वह बड़े फक्र से नंगा ही दरबार में चला आया और बड़ी शान से बोला देखो मैंने कितनी सुंदर दैविक  राजसी वस्त्र पहने है ...राजा को नंगा देख वह व्यक्ति मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ पर उपरी दिखावे के लिए राजा की शान में झूठी तारीफ़ करते हुए बोला महारज सिर्फ एक विद्वान  ही आपके दैविक  राजसी वस्त्र को देख सकता है , जो मुर्ख और देशद्रोही है उसे आप सिर्फ चादर ओढ़े अर्ध नग्न दिखलाई देंगे ....राजा ने भी अहंकार में अपने दरबारियों से पुछा बताओ मेरे दैविक  राजसी वस्त्र कैसे है ?यूँ तो राजा के दरबार में मुर्ख , धूर्त , चाटुकार और विद्वान चारो किस्म के दरबारी और प्रजा मौजूद थे , पर राजा अपनी आत्म प्रसंशा  के मोह में इतना डूबा रहता था की उसे किसी का अपना प्रति हल्का सा भी विरोध न भाता , जो भी दरबारी उसके किसी फैसले से सहमती ना दिखाता , उसे अपने पद से हाथ धोना पड़ता या फिर उसे ऐसे किसी महत्वहीन पद पर डालकर हमेशा के लिए उसका मुंह  बंद कर दिया जाता , जहां वह अपने बीते हुए कल को याद करके सिर्फ आहे भर सकता ....

ऐसे में सिर्फ धूर्त , मक्कार और चमचों  का ही राजदरबार में बोलबाला था और इतना ही नहीं ऐसे लोगों ने जनता में भी ऐसा भ्रम फैला दिया गया था , की उनका राजा कितना प्रजा प्रेमी है और जब भी राजा कोई कठोर फैसला लेता है , वह जन हित के लिए ही होता है , ऐसे में जो धूर्त और चमचे किस्म के लोग होते वह राजा का गुण गान करके अपना कोई ना कोई फ़ायदा  किसी ना किसी तरह से उठा लेते और जो लोग राजा के फैसले की समीक्षा दिमाग से करते और राजा को उसके फैसले के विपरीत सलाह देते , उनपर राजा और उसके चमचे दरबारी देशद्रोह का मामला बनाकर उन्हें प्रताड़ित करते , ऐसे में एक  विद्वान दरबारी अपने आप को राजा के फैसले से दूर रखते और आम नागरिक सच्चाई जानते हुए भी राजा की हाँ में हाँ मिलाने में ही अपनी भलाई समझता ...सब दरबारियो और जनता को राजा सामने से पूरा नंगा नजर आ रहा था , पर किसी में इतनी हिम्मत ना थी की वह सच बोल कर राजा को बता सके की वह किसी देविक राजसी कपड़ो में नहीं लिपटा ....

राजा भी स्वंय जानता था की वह नंगा है , पर अपने को विद्वान समझने की जिद्द  ने उसे मूर्खों  का महाराज बनने पर  मज़बूर  कर दिया ....आज फिर से यही कहानी भारत के समाज में एक  बार फिर से जीवित हो गई है ......की जो हो रहा है वह कितना वाज़िब  है ...पर सच कहने की हिम्मत किसी में नहीं और जिनमे है , उन्हें राजा के धूर्त चमचे और बाकी लोग देश द्रोही या फिर कालेधन का सौदागर बताने से नहीं चुकंगे ....

यह तो बात हमने की राजा , उसके दरबारियों और प्रजा के संदर्भ में , की कई बार जल्दीबाजी में लिया गया फैसला अविवेक पूर्ण होता है या फिर उसे अमल में लाने का तरीका गलत होता है पर यह समीक्षा कौन और किसे समझाए ...अब हम चलते है एक  ऐसी कहानी की और जो आज के भारत की आर्थिक व्यवस्था को उस रूप में देखती है ....बहुत पहले की बात है ..एक  राजा था जिसका नाम चौपट था , उसके राज्य का नाम था अंधेर नगरी ....उस राजा के राज्य में एक  विचित्र आर्थिक नियम था , की उस राज्य में हर चीज टका सेर के भाव थी ...मतलब हर चीज का एक  ही भाव था , आप एक  सेर सोना ले ...तो भी टका और आप एक  किलो नमक ले तब भी टका ..या फिर आप एक  किलो मिठाई या लकड़ी कुछ भी सबका एक  ही दाम था टका सेर ...

अब सोचने में लगता है यह कैसे मुमकिन की हर चीज का एक  ही दाम हो ..कैसे नमक को सोने के बराबर , या लकड़ी को मिठाई के बराबर या बकरी और हाथी एक  ही दाम में बेचा जा सकता है ..कोई भी व्यक्ति कहेगा यह तो बिलकुल बेवकूफी भरा सिस्टम था ...पर अगर मैं कंहू की राज्य की जनता उसे बड़ा समझदारी भरा बता कर खुद को चौपट नगरी की प्रजा बोल कर गर्व का अनुभव करती थी ..तो शायद आप इसे न माने ...पर आज का भारत ऐसा ही है ...अब हर इन्सान को बैंक से बराबर पैसा मिलेगा ..चाहे वह 5 हजार रुपया कमाने वाला गंगू ठेले वाला हो या लाखों  की नौकरी करने वाला अफसर करमचंद हो ....सबको ATM ..से बराबर पैसा मिलेगा ..अब वह 100 रूपये वाला मज़दूर  हो या फिर 5 लाख रूपये का टैक्स देने वाला सेठ फकीर हो ...अब कितनी बड़ी समानता है ..की शादी में सबको सिर्फ 2.5 लाख मिलेगा ...अब यह और बात है की एक  आदमी जिसने हर साल टैक्स दिया और उसकी आमदनी सालाना 50 लाख है और उसके सिर्फ एक  संतान है और उसके विपरीत एक  ऐसा आदमी जिसके 5 संतान है और जिसकी कमाई 2 लाख सालाना है और जिसे सिर्फ शादी में 2.5 लाख खर्चने है अब उसकी शादी का बजट भी बराबर है ...तो यह हालत ऐसे ही ...की ..

अंधेर नगरी चौपट राजा टका सेर भाजी टका सेर खाजा ...


अब बात करते है लोगों की प्रतिक्रिया के ऊपर की लोग इस फैसले के समर्थन में क्यों है ...इस देश का सबसे बडा दुर्भाग्य है की यहां की आम जनता ..कभी दूसरे  को देख खुश नहीं होती , उनकी ख़ुशी अपने नुकसान से ज्यादा , पड़ोसी  , रिश्तेदारों और अपने ही दोस्तों का नुक्सान और तकलीफ देखने में होती है ..यही वज़ह  है आम आदमी अपने नुकसान और परशानी को न देख दुसरे के नुकसान में अपनी खोखली ख़ुशी ढूंड रहा है ...सबके अंदर एक  अनजाना संतोष है ...की उसके यहां  हराम की काली कमाई थी , जो डूब गई ...

यहां की जनता की सोच एक  बाल्टी में पड़े हुए केकड़े जैसी है जो इक दुसरे की टांग दबोचे पड़े रहते है ..वह ना तो खुद बहार निकलते है और न ही दूसरे  को बाल्टी से बहार निकलने देते है ....

इसकी एक  सच्ची और आँख देखी झलक , एक  सज्जन कह रहे थे ,अरे मेरा तो सिर्फ 5 हज़ार  था उसका तो मैं कुछ कर लूँगा पर पड़ोस के शर्माजी के पास  हराम का 5 लाख था वह डूब गया , उधर शर्माजी कह रहे है मेरा तो 5 लाख था , पर मेरे बड़े साहब वर्माजी तो खूब मोटा माल जमा करके बैठे है उनका 5 करोड़  था वह गया बट्टे खाते , मेरे 5 तो दो चार फर्जी कम्पनी के खातों  में खप जायंगे ...उधर वर्माजी कह रहे है मेरा क्या सिर्फ 5 पेटी , 3 तो पहले ही खपा दी , बची 2 उनका भी बैंक मेनेजर से 20% पर  काम हो जाएगा ..पर यह हमारे निगम का अध्यक्ष क्या करेगा , जिसके 500 पेटी है और अध्यक्ष कह रहा है मेरा क्या विधायक पर  ज्यादा है , विधायक कह रहा है मेरे पर  क्या सांसद पर  मुझसे ज्यादा है और संसद कह रहा है , अरे मुझे क्या फ़िक्र मैंने  तो पहले ही सारा माल ठिकाने लगा कर डॉलर में बदल लिया , बांकी को सोने और दूसरी बेनामी सम्पति में लगा दिया , सोचे तो वह लाला , जो काश में खेलते है और काश वाला लाला , हंस रहा है , अरे इतनी पेटी और खोखे तो कब के निबटा दिए ....सच तो यह ,जनता एक दूसरे  के नुकसान में अपनी झूठी ख़ुशी देख रही है ....खुद कितने परेशान  है उससे मतलब नहीं , पर दूसरा इनसे ज्यादा तकलीफ में है इसकी उन्हें ख़ुशी है ... 

सच बात यह है सरकार ने जो भी फैसला लिया उससे किसी को आपत्ति नहीं ..पर फैसला लेते वक़्त आने वाली समस्याओं  ना समझना और उनके सही विकल्प ना देना ही सबसे बड़ी मुर्खता और हठधर्मिता है ..सवाल यह है ..की इसके बाद क्या काला धन नहीं होगा ? क्या आतंकवाद नहीं होगा ? और सबसे बड़ी बात आपने इन सबको रोकने के लिए क्या कदम उठाये उसकी क्या तस्वीर है , यह भी तो जनता को समझा दीजिये ..आप अपनी जिम्मेदारी से भाग कर , अपनी गलती को जनता के गले डाल कर उसे झूठी देश भक्ति का लॉलीपॉप  दे रहे है .............

कोई सरकार से यह पूछे की नकली करेंसी छपती क्यों और कैसे है , आप उसकी रोकथाम के लिए अब क्या नया करेंगें  की आगे ऐसा ना हो , क्या आतंकवाद सिर्फ नकली नोटों से चलता है , काले धन की परिभाषा क्या है , कल तक स्विस बैंक वाला धन काला था , आज घर में रखा धन काला हो गया ?जिन्होंने यह गुनाह किया , आपने उनके खिलाफ क्या किया और कितने लोगो को पकड़ा , सिर्फ नोट बंद कर देने से यह समस्या वक्ती तौर पर  हल हो जाएगी ,पर कल क्या होगा ?...

अब यह फैसला अच्छा है या बुरा ,इसे कहने के लिए तो बहुत बातें  है ...पर मेरा सिर्फ एक  सवाल , अगर यह फैसला अमेरिका या किसी यूरोप के देश में होता तो , आप देखते की लाइन में नेता , अभिनेता और सारे प्रसिद्ध लोग लाइन में लगकर अपने अपने नोट जमा करवाते या बदलवाते ... ...और ऐसा करके देश के कानून का सम्मान करके खुद को भी गर्व से देश का एक  आम नागरिक कहते ...क्या आपने अभी तक एक  भी नेता (चाहे विधान सभा या लोक सभा या निगम ) के वर्तमान या पूर्व नेता , खिलाडी , फिल्म स्टार या किसी भी अमीर या थोड़े से प्रसिद्ध आदमी को लाइन में लग कर नोट जमा करवाते या बदलवाते देखा है ? अगर हाँ तो जरा पब्लिक से शेयर करे ...अगर अभी तक ऐसा आपने नहीं देखा तो आप अपने आप से पूछे , की क्या इन लोगो को अपने नोट नहीं बदलवाने या इनके पास ऐसे कोई नोट नहीं है ..अगर है तो इन्होने अपने नोट किससे और कैसे बदलवाए ? अगर बदलवाए तो कैसे ?जबकि नोट बदलवाने के लिए आप को खुद अपने सर्टिफिकेट के साथ बैंक के पास जाना होता है .....दूसरे  के आधार या पेन कार्ड का इस्तमाल करके नोट बदलवाना कितना उचित है ?क्या दुसरो से नोट बदलवाना या अपने जानपहचान के बैंक मेनेजर से पीछे से काम करवाना , फिर मीडिया में भाषण देना कितना उचित है ?

क्या ऐसे दोगले लोगो से आप देश में काल धन और भ्रष्टाचार  खत्म करने का सपना संजो रहे है ?कृपया जज़्बात से ज्यादा दिमाग का इस्तमाल करे और सोचे क्या कोई एक  भी अहम आदमी इस देश के लॉ एंड आर्डर को मानता है ? ऐसे में एक  स्वच्छ , साफ़ सुथरे , काला धन और भ्रष्टाचार  से मुक्त भारत का सपना ...सिर्फ सपना है ...जब यह लोग अपना इतना सा काम आम इन्सान की तरह तक नहीं कर सकते ..तो और क्या करते होंगे ....आगे आप समझदार है ....

By 
Kapil Kumar 

Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely coincidental.' ”
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