Sunday, 4 December 2016

ख़ामोश आँखें .......




तेरी आँखों की ख़ामोशीयां जैसे करती है मुझसे कुछ सवाल 
इनमे छुपा  है कितना प्यार , फिर भी मांगते हो मुझसे इक़रार ...........


तेरे सूखते होठ जैसे देते है मेरी हर बात का जवाब 
जब तक तुम इन्हें ना चूमोगे , यह कैसे होंगे लाज़वाब ..............


तेरे भरे हुए कपोलों की सुर्खिया , मुझे मांगती है यह
कैसा हिसाब
जब तक तुम इन्हें ना छुओगे , फिर यह कैसे रहेंगें  सुर्ख लाल ..............


तेरी लहराती जुल्फों की लटाओं को मैं
क्या दूँ जवाब 
जो बिखरी है मेरे इंतजार में , बनके एक  महकता शबाब .............


तेरे चेहरे की मुस्कान जैसे करती एक अनजाना  सा अहसान 
मेरी वफ़ा को तोलने वाले , कभी तू भी तो हो मुझपर  कुर्बान .............


तेरी आँखों का कजरारा , जिसने मुझे देखा और धिक्कारा 
हे भटकने वाले मुसाफिर , क्यों
ढूंढता  है तू कोई और सहारा ..............

तेरे माथे का लश्कारा , जैसे देता है मुझे कोई आवाज़ 
जिसकी फीकी पड़ती चमक , जैसे कहती है अब तो कर लो मेरा आगाज़ .......

By
Kapil Kumar 
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