Sunday, 27 December 2015
Friday, 25 December 2015
Wednesday, 23 December 2015
नारी की खोज---7
अभी तक आपने पढ़ा (नारी की खोज भाग –1 , 2 , 3,4 ,5 और 6 में ) ...की मैंने बचपन से आज तक नारी के भिन्न भिन्न रूपों को देखा .......मेरे इस सफर की आगे की कहानी.....
गतांक से आगे .......
हर इंसान सपने देखता है और उनका मतलब, हर कोई अपने अपने तरीके से लगाता है कोई उन्हें याद करके ,उनसे जीवन में पहले घटी हुई किसी घटना का सम्बन्ध स्थापित करता है तो कोई उसमें आने वाले भविष्य की झलक देखता है .... कभी सपने हमारे मूड को अच्छा बना देते है तो कभी हमें एक अनजाने डर में भी डूबा देते है ..... अधिकतर सपने हम सुबह होने तक भूल जाते है , यूँ तो सपने आते है चले जाते है पर कुछ सपने अपने निशान भी छोड़ जाते है ....ऐसा ही एक ना भूलने वाले निशान, मुझे अपने सबसे पहले रंगीन सपने ने दिया था .....
सुनील के घर, एक दिन और रुकने के बाद मैंने उससे विदा ली और बस पकड अपने घर की ओर रवाना हो गया .... मन में एक उदासी थी की , क्या क्या सपने देखे थे और सारे सपने , हवा के एक झोके से , रेत के महल की तरह, एक ही झटके में ढह गए ....
पर उस वक़्त मुझे क्या पता था , की आने वाले दिनों में मेरी प्यास एक शीतल झरना बुझाने वाला था और वह झरना मुझे यौवन की भट्टी में तपा तपा कर , एक कुशल घुड़सवार बनाने वाला था ......
सुनील के घर से आने के बाद , मैं उस घटना को दो चार दिन में भूल गया , कि ऐसा भी कुछ घटित हुआ था । पर मेरा शरीर , जो लडकपन से युवा अवस्था में कदम रख चूका था , उसके लिए वह सब भूलना शायद इतना आसन ना था ....जब जब मेरा लड़कपन , उस घटना को याद करता , एक अनजानी सी कसक बदन में उठ जाती .... सब कुछ ना पाते हुए भी मैंने , नारी के शारीर को प्राकृतिक अवस्था में देखा था , उसके स्पर्श और आलिंगन का आनंद भोगा था ...
गर्मियों के दिन थे , एक रात मैं खुले आसमान के नीचे , घर की छत पर खाट पर लेटा हुआ बिस्तर पर करवट बदल रहा था, की , अचानक से , सुनील के घर वाली घटना , मेरी आँखों के सामने उभर आई , उस घटना को याद करने से , मेरे ख्यालों में रोनी की बीवी के जिस्म से लिपटने , उसके उभारों को चूमने और मसलने का अहसास उभरने लगा , जो मेरे जिस्म में एक अजीब सी ताकत और बैचेनी फूंकने लगा , अभी मैं उस अहसास को अपने जिस्म में समेट पाता ...की तभी मुझे पसीने से लथपथ उसका शरीर याद आ गया , जिसने मेरे उभरते अरमानों को उठने से पहले ठंडा कर दिया था । मेरी हालत ऐसी थी , की ....
किसी शाकाहरी इंसान ने भूख की रों में बहकर , मांस का सेवन तो कर तो लिया ,पर भूख लगने पर ,उसके ख्याल भर से, उसे कभी उबकाई, तो कभी उसकी चाहत उभर आती हो .....
ख्यालों के इस कशमकश से लड़ते हुए , मेरी कब आँख लग गई , मुझे पता भी ना चला और मैं गहरी नींद में सो गया ... सपने में मैंने देखा , एक अत्यंत सुन्दर स्त्री मुझे अपनी तरफ इशारा करके बुला रही है , उसके आँखों के आमन्त्रण से सम्मोहित सा , मैं उसकी और खिंचा चला जा रहा हूँ , फिर वह मुझे अपने साथ एक बिस्तर पर ले जाती है । वहां मैं उसके साथ अपनी अधूरी इच्छा को पूर्ण करता हूँ और अपने यौवन के मद को उसके अन्दर स्खलित कर देता हूँ ... उस वक़्त मुझे ऐसे महसूस होता है , जैसे मैंने किसी स्त्री के साथ बिस्तर पर सम्भोग किया हो ...उस वक़्त ,अपने यौवन की इच्छा के पूरा होने से, मुझे एक असीम आनंद की प्राप्ति होती है और मैं बहुत हल्का हल्का महसूस करता हूँ । जैसे किसी ने अपने शरीर से कोई भारी बोझ अलग कर दिया हो , उस वक़्त मुझे अहसास हुआ ,की आज मैंने अपनी असली मंजिल को पा लिया ....
अगले दिन जब सूरज की तीखी रोशनी मेरी आँखों में चुभी और भिनभिनाती मक्खियों ने मेरा सोना मुश्किल कर दिया । तब मुझ अहसास हुआ , की मैं उस सुन्दरी के साथ बिस्तर पर ना होकर , अकेला बिस्तर पर पड़ा हूँ , पर वह अहसाह इतना गहरा था ,की , मेरा दिल या मानने को तैयार ही ना था , वह सब हकीकत नहीं सिर्फ एक सपना था ...
उस आनंद से मेरे जिस्म का रोम रोम जैसे तृप्त था और जिस्म से उठती अलसाई सी अंगड़ाई , मेरे अहसास को और मजबूत कर देती ...मुझे अपने ऊपर विश्वास ही नहीं हो रहा था , की ,कल रात मेने जिस आनंद को भोगा था , असल में वह सब सिर्फ सपने में था ....उसका हकीकत से कुछ भी लेना देना नही था .....
फिर भी, उस आनंद को याद भर कर लेने से बदन में एक अजीब सा नशा भरा हुआ था और एक मीठी मीठी सी थकान मेरे अस्तित्व पर छाई हुई थी । जो मुझे गर्माते सूरज की रोशनी में भी , बिस्तर पर लेटे रहने के लिए मजबूर कर रही थी .....
काफी देर लेटे रहने के बाद, जब लघु शंका को एक समय से अधिक रोक पाना मेरे लिए मुनासिब ना हो पाया और आखिर कर मुझे बिस्तर छोडना ही पड़ा । ....किसी तरह बिस्तर से उतर कर, मैं बाथरूम में चला गया , बाथरूम में मैंने , जैसे ही अपने पजामे के नाड़े पर हाथ रखा , तो मैं चौंक पड़ा , देखा, पजामे पर , एक बहुत बड़ा सा धब्बा बना हुआ था ...
जैसे किसी ने ढेर सारा गोंद उसपर चिपका कर छोड़ दिया हो ....
उस धब्बे को देख, मेरा माथा ठनका । यह धब्बा कल तो नहीं था , जब मैंने यह पाजामा पहना था , फिर यह कब और कैसे बना ? मैंने बहुत सोचा , पर कुछ समझ नहीं आया । नहाने धोने के बाद , मैं उस बात को लगभग भूल गया ....
किन्तु , उस दिन के बाद से जब जब रात आती और मैं अकेला बिस्तर पर करवटें बदलता , मेरे शरीर में एक बैचेनी से होने लगती , मेरा यौवन , अपने अनजान साथी की तलाश में तड़पने लगता , मेरा मन चाहता की, मुझे फिर से कोई ऐसा सपना आए , जिससे मैं अपने तड़पते यौवन की अतृप्त प्यास को बुझा सकूँ ....पर ऐसा हर बार ना होता ...
वक़्त के साथ ,धीरे धीरे उस सपने को मैं लगभग भूल गया और अपनी रोजाना की जिन्दगी में मशग़ूल हो गया । एक दिन मैं, दिन भर की आवारागर्दी से इतना थका हुआ था , की बिस्तर पर आते ही गिर कर ,नींद के आगोश में खो गया ... अभी मैं कच्ची नींद में था ,की, मैं फिर से, एक सपने की गिरफ्त में आ गया , पर उस वक़्त मैं गहरी नींद में ना था , ऐसा लगता था जैसे मैं अर्धचेतन अवस्था में लेटा हुआ हूँ , जिसे सपने के साथ साथ बाहर की दुनिया का भी कुछ अहसास जान पड़ता था ...
सपने में मैंने देखा , की , मैं किसी सुंदर रूपवती के साथ बाग़ में लेटा हूँ ...... वह और मैं दींन दुनिया से बेखबर प्रेम विहार में डूबे हुए है , उस रूपवती के आगोश में लिपटा हुआ, मैं उसके उरोजो के साथ खिलवाड़ कर रहा हूँ , उसकी मधुर खनकती हंसी, मेरे हौंसले को और बढ़ावा दे रही है ..... मैं धीरे धीरे उसके दहकते होंठों से अपनी प्यास बुझाने लगता हूँ , फिर वह और मैं अपने वस्त्र उतार कर जैसे ही सम्पूर्ण आनंद के लिए तैयार होते है , मैं अपनी मंजिल को पाकर , उसका साथ छोड़ देता हूँ , पर इसी में मुझे असीम आनंद की प्राप्ति हो जाती है .....की , तभी ,मैं महसूस करता हूँ जैसे मैंने अपने तन से , यौवन से लदे किसी ऐसे बोझ को जुदा कर दिया , जिसके शरीर से विसर्जित होने से ,मुझे राहत के साथ आनंद की प्राप्ति भी हुई ...
यह आनंद कुछ ऐसा ही था , जो मैं कभी कभी अपने लड़कपन को ठंडा करने के लिए हाथों से करता था ....
तभी मैं , सपने से निकल . हकीकत की दुनिया में आ गया । मैंने महसूस किया की , मेरा पजामा आधा गीला है .... मैं पजामा गीला होने का राज़ समझने की कोशिश में लग गया ..... कभी मुझे लगता , क्या मेने इस उम्र में , बच्चों वाली हरकत तो नहीं कर दी , पर स्थिति ऐसी भी ना थी ,कि मेरा पजामा इतना ज्यादा भीगा हुआ हो....
मेरा दिमाग , बार बार सोचता ,आखिर पजामा गीला हुआ तो कैसे ? मैंने अपनी स्थिति को बहुत ग़ौर से देखा और समझा , फिर अपने सपने को याद करने लगा । मुझे याद आया, सपने में, उस स्त्री के साथ प्रेम क्रीडा के दौरान... मेंने जो स्खलन किया था , वह असल में सपने में नहीं हकीकत में हुआ था .....
अगर मेरी जगह कोई और लड़का होता तो शायद डर जाता , वह सोचता , उसे ना जाने कोई यौन रोग से सम्बंधित या फिर इस उम्र में बिस्तर गीला करने की बीमारी तो नहीं लग गई ? पर मैंने बचपन से ही सेक्स से सम्बंधित समस्याएं पढ़ी थी । यह भी उन समस्याओं में से एक थी , जिसका सामना हर लड़के को अपनी यौवन अवस्था में एक ना एक दिन करना पड़ता ही है ....
मै तो जानता था , यह एक प्राकृतिक क्रिया है । पर , कॉलेज में ना जाने कितने ही लड़के इसे “स्वप्नदोष” बीमारी समझ नीम हकीमों से अपना बिना मतलब का इलाज करवाते थे ....जो समझदार थे , वे दबे छिपे इसे हम जैसों से समझ लेते थे , की ...
अगर किसी बर्तन में दूध उसकी कैपेसिटी से ज्यादा भरा जाए तो उसका बाहर निकलना अनिवार्य है .....
गर्मियों की छुट्टी ख़त्म कर , मैं कॉलेज में आ गया । सुनील न मेरी पहली घुड़सवारी की नाकामी मेरे मना करने के वाबजूद भी हमारे ग्रुप के लोगो में अपने तरीके से फैला दी ... यह और बात थी की , कभी किसी ने मुझसे, उस घटना के बारे में ज्यादा पूछा नहीं , शायद ....
“हमाम में सभी नंगे थे और एक नंगा दूसरे नंगे को और क्या नंगा करता”......
या तो कुछ लोगो को इसका अनुभव था या फिर सबने कहीं सुन रखा था , की पहली , दूसरी या शुरू में ऐसा होना स्वाभाविक है , की आदमी अपनी उत्तेजना पर काबू नहीं रख पाता और बहाव में बह जाता है ...इसे समझे तो यह ऐसा ही है ।
जब आप नयी नयी गाडी चलाना सीखे तो , कभी क्लच ज्यादा दबता है तो कभी स्पीड , दोनों में एक सामंजस्य आदमी को धीरे धीरे अनुभव से ही आ पाता है । अधिकतर , नया सिखने वाला शुरू शुरू में गाडी को झटके देकर चलाता है या फिर सडक पर अचानक से बंद कर देता है ....
सुनील और मेरा एक और कॉमन दोस्त था , जिसे हम सब उसके खास नाम “ताउजी” कह कर बुलाते थे । सुनील की और ताउजी की भी अच्छी जमती थी , एक दिन मैं ताउजी के कमरे में गया तो , सुनील और वे दोनों बैठे किसी बात पे हंसी ठट्टा कर रहे थे । मुझे वहां आया देख , ताउजी बोले , तो बॉस! इस गर्मियों में , आपने भी “गंगा स्नान कर ही लिया” और ऐसा कह दोनों जोर जोर से हंसने लगे ....
कहते है चोर की दाढ़ी में तिनका , अब मेरी हालत वैसी ही थी , मुझे लगा शायद सुनील ने इसे मेरी नाकाम घुड़सवारी के बारे में बता दिया है ....मैं भी अपना किताबी ज्ञान झाड़ते हुए बोला यार , बस पहली पहली बार में मज़े से ज्यादा सजा हो जाती है ...और दिखावे के लिए बोला .... भाई पहली बार करने से “मेरा तो सूज भी गया”“ , मुझे तो सुनील की तरह इसकी आदत जो नहीं है और ऐसा कह मैं भी उन दोनों के साथ हँसने लगा ... अब ताउजी की जिज्ञासा अपनी चरम सीमा पर थी , वे मुझसे खोद खोद कर सवाल करने लगे ...उनके सवालों से एक बात तो पक्की थी , उन्हें यह पता था ,की ...
मैं घोड़ी पे चढ़ा था , पर घोड़ी पर ऐड लगाने से पहले गिर गया था .....
उसका उन्हें गुमान ना था , शायद सुनील ने उन्हें आधी बात ही बताई थी ... गप्पे हांकते हुए आधी रात होने को आई थी , पर गप्पो का दौर था की ख़त्म ही ना होता था .... कॉलेज में अधिकतर लड़के , सिर्फ लडकियों की ही बाते करते थे , किसका किससे चक्कर है या कौन किसका दीवाना है , पढाई की बातें सिर्फ एग्जाम वाले दिनों या जिस दिन कोई टुटोरिअल देना होता , उस दिन होती या फिर क्रिकेट मैच वाले दिन क्रिकेट की बातें , वरना बाँकी सारा दिन रात , लड़कों का बस एक ही टॉपिक होता ...
“नारी का स्वाभाव, उसका शरीर , उसकी पसंद , ना पसंद का क्या रहस्य है?” .....
कितनी अजीब बात थी , जिस बात को उन्हें अपने अनुभव से समझना था , उसे वह किसी सस्ती सडक छाप पत्रिका से , या एक दुसरे के झूठे सच्चे अनुभव से सीखते थे...
ताउजी के कमरे से विदा ले , हम दोनों आकर अपने अपने कमरे में सो गए ....
अगले दिन रविवार था , उस दिन सब लोग देर से सो कर उठते , हम सब दोस्तों ने उस दिन इकट्ठे ही नाश्ता किया । अगली सुबह सुनील मेरे कमरे में मुझे उठाने आ गया , बोला .... चलो ताउजी को भी नाश्ते के लिए साथ ले चलते है ...
हम दोनों ताउजी के कमरे पर पहुंचे और दरवाजा खटखटा दिया । ताउजी नींद में थे । काफी देर खटखटाने के बाद , उन्होंने उंघते हुए दरवाजा खोला और बोले , अरे यार , अभी थोड़ी देर बैठो , मैं जरा ब्रश कर लूँ , फिर चलते है ....
ताउजी ब्रश लेकर जैसे ही ,मेरे सामने से निकले , की मैंने ... उनके पजामे पर एक बड़ा सा धब्बा बना देखा । उसे देख ,मेने सुनील के कान में कहा , आज ताउजी ने रात में गरमा गर्म सपना देखा है ...उसने मुझसे पुछा , तुझे कैसे पता , तो मैंने ताउजी के पजामे की तरफ इशारा कर दिया , उसे देख वह भी मंद मंद मुस्कुराने लगा ....
नाश्ते की टेबल पर बैठे बैठे मैंने भी , ताउजी से कल की उनके द्वारा की गई ज़िरह बाज़ी का बदला लेने की ठान ली , कल बच्चू बहुत खोद खोद कर सवाल पूछ रहे थे ... आज देखता हूँ क्या जवाब है ?
मेने ताउजी से पुछा , कल रात बड़े रंगीन सपने आए , ताउजी सफ़ेद झूठ बोलते हुए बोले , अरे नहीं कल तो मैं रात भर मैथ्स का असाइनमेंट कर रहा था और फिर सो गया । मैं बोला फिर सपने में क्या हुआ ?
ताउजी बोले , अबे , उस जैसे खडूस मैथ्स टीचर का काम करने के बाद, किसे भला कभी रंगीन सपना आ सकता है ? मैंने भी ताउजी को नीचा दिखाने की ठान रखी थी । मैंने सबके सामने , उनके पजामे की तरफ इशारा कर दिया और पूछा तो , यह निशान कैसा ? अब ताउजी सकपका गए और सफ़ेद झूठ बोले , अरे कुछ नहीं बस ब्रश करते वक़्त कुछ पानी गिर गया....
उनकी बात सुन हम सब जोर जोर से हँसने लगे , शायद अधिकतर लड़के उस अनुभव से गुजर चुके थे या फिर गुजर रहे थे ..सबको हँसता देख , मैंने ताउजी से कहा ...
ताउजी सिर्फ आपके पजामे पर ही पानी नहीं गिरा , यह पानी , आजकल सबके पजामों पर रात में गिरता है और ऐसा कह सब जोर जोर से हँसने लगे ...उस वक़्त मेरी हंसी थी की थमती ही ना थी , मैं जोर जोर से पेट पकड कर हंस रहा था , शायद अपनी हीन भावना को हंसी में उड़ा रहा था ....
मुझे यूँ ज़ोर ज़ोर से हँसता देख, मेरे बराबर में लेटी मीना मुझे जोर जोर से हिलाने लगी और गुदगुदी करते हुए बोली , अरे क्या पागल हो गए हो , जो सपने में यूँ बेबकूफ़ों की तरह हंस रहे हो ....
मैंने आँखें खोली तो देखा , मैं अपनी गर्लफ्रेंड मीना के साथ बिस्तर पर लेटा हुआ था , उस वक़्त हम दोनों , मेरे कमरे में बिस्तर पर लेटे थे ,उसका सर मेरी छाती पे था और मैं एक हाथ से उसके बालों को सहला रहा था , ना जाने कब “KK बॉस” वाला किस्सा सुनाते सुनाते मेरी आँख लग गई थी और मैं अपने उस लडकपन में खो गया था , जिसने मुझे नारी के रहस्य को समझने के लिए एक नयी दिशा दी थी ....
कितनी अजीब बात थी , उस वक़्त , एक खुबसूरत जवान लड़की मेरे साथ थी , फिर मुझे अपने ऊपर पूरा कण्ट्रोल था , ना मुझे कोई घबराहट थी , ना किसी तरह की उत्तेजना , मैं शांत निश्चल सा लेटा हुआ था ....इसके विपरीत रोनी की बीवी के सपर्श से ही , मैं अपने बहाव में बह गया था .....
शायद उस दिन नाले का पानी पीना मेरी किस्मत में नहीं लिखा था , इसलिए मैं नाले में गिरने से पहले ही फिसला गया था ....
मैंने मंद मंद मुस्कराते हुए मीना की तरफ देखा , उसने अपनी नजरे मेरे चेहरे पे टिका दी और दोनों कोहनियां मेरी छाती पर रख कर बोली , मुझे देख कर क्यों हंस रहे हो ? बताओ ,क्या मेरा सूट अच्छा नहीं है , या बालों में लगे क्लिप में कोई प्रॉब्लम है ?
मैंने हँसते हुए कहा ,नहीं यार, ऐसी कोई बात नहीं , मैं तुझे देख कर नहीं हंस रहा , मैं तो सपने के बारे में सोच हंस रहा हूँ , की , मैं भी कितना बेवकूफ था , जो मीठे झरने को छोड़ , गंदे नाले से प्यास बुझाने चला था । मेरी बात का मतलब मीना को समझ नहीं आया । वह मुझे कौतुहल भरी नज़रों से घूरने लगी , मैंने भी बात को बदलने के लिए , उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में भर लिया और उसके होठों को अपने होठों की गिरफ्त में ले लिया ....
क्रमश :......
By
Kapil Kumar
Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely coincidental.' ”
मोहब्ब्त के नाम .......
यूं बीच रास्ते मे छोड़
कर जाना तो बस तुम्हारी अदा है ....
सारी रात यूं तेरी याद
मे तडपना , अब मेरी सजा है
जिस दिन मुझे अपना समझ
लोगी दिल से तुम
देखना फिर कैसे लगेगा की
जीने मे भी मजा है ......
कभी प्यार का इजहार ही
कर दो ...
यूं तो हम मिल नही सकते
कुछ सपने मे ही हकीकत साकार
कर दो ....
उम्र निकल जायेगी , हाथ
से रेत की तरह
चलो इसे अब मोहब्ब्त के
नाम कर दो ...
By
Kapil Kumar
Friday, 18 December 2015
तुम ऐसा क्यों करती हो.........
तुम हो मेरी धड़कन , फिर दुसरे के जिस्म में क्यों धडकती हो
तुम हो मेरी सांस , फिर क्यों इस तरह उखड़ती हो ?........
तुम्हें छूने की इज्जाजत भी मुझे नहीं
फिर मेरी बातो से क्यों मचलती हो ...
तेरे दिल में , जलता है दीपक मेरे प्रेम का
फिर यह उजाला , किसी और के लिए क्यों करती हो ......
तुम बहाती आसूं मेरी याद में
फिर भी इकरार करने से क्यों डरती हो ......
तुम हो मेरी सुबह , तुम हो मेरी शाम
फिर सूरज का उजाला कहीं और क्यों करती हो ....
तुम हो मेरी साकी , तुम हो मेरा जाम
फिर मेरे बहकने पर , क्यों बिगडती हो .......
तुम हो मेरी गजल , तुम हो मेरी शायरी
फिर मुझे अपनी , चिलमन से क्यों जुदा करती हो .......
तुम हो मेरी मंजिल , तुम हो मेरी हमसफर
फिर राह में किसी और का हाथ क्यों पकडती हो .......
तुम हो मेरी आरजू , तुम हो मेरी जुस्तजू
फिर किसी और के अरमान क्यों पूरे करती हो ....
By
Kapil Kumar
Tuesday, 15 December 2015
नारी की खोज---6
अभी तक आपने पढ़ा (नारी की खोज भाग –1 , 2 , 3,4 और 5 में ) ...की मैंने बचपन से आज तक नारी के भिन्न भिन्न रूपों को देखा .......मेरे इस सफर की आगे की कहानी.....
गतांक से आगे .......
इंसानी फितरत भी अजीब है , अगर हम इंसानी फितरत को ढूंढने निकले तो शायद दुनिया के सारे जानवर भी कम पड़ जाए , क्योकि इंसान के अंदर लगभग हर जानवर के गुण है...
उस रात हम दोनों ने खुब गप्पे की और सो गए , मैं रात भर ना जाने किस तरह के सपने देखता रहा ...अगले दिन मैं उठा तो, बहुत जोश और उत्तेजना से भरा हुआ था , आखिर इतने दिनों बाद, आज जीवन का सबसे बड़ा सपना सच होने जा रहा था ...ऐसा सोच सोच के, शरीर उत्तेजना से भरा जा रहा था .... की.... नारी का नग्न शरीर देखने में कैसा होगा और उसे भोगने के बाद कैसा आनंद आएगा ?
सुबह सुबह हम दोनों उठ गए और नास्ता करने के बाद , आने वाले दिन की प्लानिंग में लग गए । मैंने सोचा , यह मुझे किसी अपनी ऐसी जानने वाली , जिसके साथ इसके ऐसे सम्बन्ध रहे हैं, के घर ले जाएगा या उसे किसी होटल में बुला लेगा , पर ऐसा कुछ ना हुआ । उसने मुझसे कहा , चलो किसी से मिलते है फिर , आगे का जुगाड़ देखते है । मैं भी जोश में भरा , सुनील के साथ घर से निकल गया ....
यूँ तो सुनील, अपने घर को गाँव बोलता था , असल में वह एक अच्छा खासा शहर था , शायद गाँव से सम्बन्ध होने के कारण, उसे घर को गावं कहने की आदत पड़ गई थी । रास्ते में चलते हुए मैंने उससे पुछा , क्या हम किसी औरत या लड़की के घर जा रहे है? इस पर उसने हँसते हुए कहा , बॉस इतनी जल्दी कुछ नहीं होता , अभी हम एक दोस्त के पास जा रहे है , उसके पास ही सारे जुगाड़ होते है , अब तुम अचानक से आगये ! अगर पता रहता तो कुछ बंदोबस्त करके रखता । चलो अब भी कुछ न कुछ तो बंदोबस्त हो जाएगा । उसके इतना कहने से मेरा दिल डूबने लगा , कहाँ तो कॉलेज में यह बड़ी बड़ी ढींगे मारता था , की मैंने ऐसे माल के साथ मजा लिया , यह किया , वह किया , अब यह कुछ ना कुछ की बात कर रहा है....
उस दिन मैंने जाना की ... “आदमी को लेने के बाद ही उसके बारे में कोई धारणा बनानी चाहिए”....
गर्मियों के दिन थे , सूरज ने आग बरसानी शुरू कर दी थी , पर उस जोश में गर्मी भी ठंडक का अनुभव दे रही थी । शायद इन्सान जोश में अपने दुःख , दर्द और अन्य कमियों को भूल जाता है .....थोड़ी देर चलने के बाद, हम दोनों एक दुकान के पास आकर रुके । सुनील को वंहा आया देख , दुकान के काउंटर के पीछे से एक लड़का निकल कर आया और बड़े जोश से सुनील से मिला और बोला , अरे सुबह सुबह कैसे आना हुआ ?
उसने मुझे देखा और मेरी तारीफ़ पूछी ? सुनील ने मुस्कुराते हुए उसे कहा , अरे चन्दन , तुझसे बात हुई थी न , बस बॉस, उसी काम के सिलसिले में आये है.. .. उसने मुझे देखा और बोला , अच्छा तो यह बात है और ऐसा कह दोनों ने ठहाके लगा दिए , उनके ठहाकों के बीच मैं झेंप गया और नज़रें घुमाकर इधर उधर देखने लगा की चन्दन मेरी तरफ मुखातिब हुआ और बोला कितने दिन रुकने का इरादा है?.... मैं बोला बस २/३ दिन , इस बात पर उसने एक आह भरी और बोला , अब इतनी जल्दी तो कुछ नहीं हो सकता , आजकल त्यौहार है, तो सब कुछ ढीला सा चला रहा है और ऐसा कह उसने अपने कंधे उचका दिए , उसकी बात सुन मेरा दिल डूबने लगा , इतनी दूर, इतनी मेहनत , पैसा और समय खर्च करके आया था .....और यह कह रहा है की कुछ नहीं हो सकता ?....
मैंने लगभग रूवांसे स्वर में कहा , यार मेरा तो आना ही बेकार गया , इस पर दोनों ने एक दूसरे के कान में कुछ कानाफूसी की और एक साथ बोले , अरे नहीं , कुछ न कुछ तो मज़ा करवा ही देंगे ... फिर सुनील के दोस्त ने कहा, चल इसे रोनी के घर ले चलते है ,वहाँ चल कर देखते है क्या सीन है? .... ऐसा कह उसने दुकान अपने नौकर के हवाले की और हम तीनों रोनी के घर की तरफ चल दिए ...
जहां शायद नारी के साथ मेरी जिंदगी का पहला और अनोखा सफर शुरू होना लिखा था , जिसका मुझे अभी तक गुमान भी ना था ......
सूरज सर पर चढने लगा था , हमारा बदन पसीने से भरने लगा ,काफी देर पैदल चलने के बाद हम तीनो एक फ़्लैटनुमा घर के पास आकर रुके । वह एक मिडिल क्लास फैमिली का घर था , घंटी बजाने पर एक अधेड़ उम्र की औरत ने दरवाजा खोला ,शायद वह रोनी की बीवी थी... एक गन्दा सा गाऊन उसके शरीर को ढके भर था .....
वह एक ३०/३५ के करीब की, हलके सांवले रंग की युवती थी , जिसपे उम्र ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था , उसका शरीर बेतरबी से इधर उधर फैला सा हुआ था , जो उसकी गुजर चुकी जवानी ,आने वाले कुरूप बुढ़ापे और मोटापे की मुनादी खुलेआम कर रहा था.... कहीं से भी देखने में, उस औरत में सुंदरता या आकर्षण जैसी कोई चीज मुझे नजर नहीं आई , उसपर वह मुरझाई और बड़ी थकी थकी सी लग रही थी....
उसकी आँखे ऊंधी सी थी और लगता था, वह सारी रात पीती रही और देर से सोई थी.....
हमारे घंटी बजाने पर ही ,वह शायद बिस्तर से ही निकल कर आई थी .... हम तीनो ने उसे गुड मॉर्निंग कहा और वह हमें इक ड्राइंग रूम में ले आई ,जिस तरह वह हमें, घर के अन्दर लाइ , ऐसा लगता था सुनील और चन्दन का वंहा आना जान लगा रहता था ....
ड्राइंग रूम में हम तीनो इक सोफे पे पसर गए । वहां पर बैठने के बाद, दोनों ने उससे पुछा , रोनी कंहा है ? उससे कुछ काम था , रोनी का नाम सुनते ही, उस औरत का चेहरा गुस्से में आगबगूला हो गया , वह अपने नथुने फुलाती हुई बोली ..... मैन , तुम तो जानता है , वह कितना पीता है , अब तो किसी छोकरी संग सारी सारी रात भी गुजारता है , एक हम किस तरह मरखप के उसके वास्ते सब कुछ करता है और उसको अपनी वाइफ का फ़िक्र ही कब होता है ? अभी तो वह पिछले दो दिन से इधर आया भी नहीं और ऐसा कह वह हमारे सामने सुबकने लगी...
बड़ी ही विचित्र स्थिति थी , कहाँ तो मैं , इन लोगो के साथ मौज मेला करने के लिए आया था और कहाँ यह औरत अपने घर का रोना धोना लेकर हमारे सामने बैठ गई , यह तो वही बात हो गई, की .....
“गए थे नमाज अदा करने और रोजे गले पड़ गए” ....
उसके घर जाते वक़्त मुझे लगा था , शायद रोनी, सुनील और चन्दन का दोस्त है और वही इन सबके लिए इनकी मस्ती का इंतजाम करता होगा... .. अब रोनी ही घर पे नहीं तो , अब इंतजाम क्या खाक होगा? ....
मेरा दिल निराशा से डूबने लगा......लगता था, जो जो सपने मेने संजोये थे , उनपर कहीं न कहीं शनि बैठा था ,हर काम में कोई न कोई विध्न जैसे पड़ना लिखा ही था .....पर उस वक़्त मुझे क्या मालुम था....की ...आज....
मुझे नारी के चरित्र का वह पहलु, देखने को मिलना था , जो आने वाले जीवन में, नारी के चरित्र की , एक नयी इबारत लिखने वाला था....
उन दोनों ने उसे ढांढस बंधाया और कहा , हाँ यह तो उसकी गलती है , की वह रात रात भर गायब रहता है और उसपर नयी नयी लड़कियों के साथ ऐश करता है । फिर चन्दन ने उससे पुछा , यह नयी लड़की कौन है ? जिसके साथ रोनी आजकल इश्क फरमा रहा है , रोनी की बीवी ने किसी का नाम लिया , जिसे दोनों ने बड़े ध्यान से सुना और अपनी मेमोरी में बिठा लिया ...थोड़ी देर बाद , जब रोनी की बीवी का रोना धोना ख़त्म हुआ तो , चन्दन ने उसके कान में कुछ कहा और इतना कहने के बाद वह , सुनील से बोला , ऐसा है मैंने इसे समझा दिया है .... अब मुझे चलना चाहिए , दुकान छोड़े काफी वक़्त हो गया , ऐसा कह वह वंहा से रुखसत हो गया ...
अब ड्राइंग रूम में, हम तीनो बैठे थे ,जुलाई का महीना था , सुबह के ११ बज चुके थे और कड़ी गर्मी शुरू हो चुकी थी , ड्राइंग रूम में चलता एकलौता पंखा किसी तरह से, हमारे पसीनो को उड़ा भर रहा था , की थोड़ी देर चुप रहने के बाद , सुनील मेरी तरह देखकर बोला, मैं थोड़ी देर घूम कर आता हूँ जब तक , तुम अपना काम निपटा लो , ऐसा कह सुनील मुझे हक्का बक्का छोड़ ,फ्लैट से बहार चला गया ....
सुनील के बहार निकलने के बाद ,हम दोनों फ्लैट में अकेले रह गए , अब मेने उस औरत को बड़े गौर से देखा , जितना मैं उसे गौर से देखता , मेरा दिल उतना ही बैठा जाता , वह देखने में कहीं से भी, उस पैमाने में नहीं बैठती थी , जिस तरह की औरतो और लड़कियों की बाते सुनील मुझे सुनाया करता था । वह बुझी बुझी सी , भारी बदन की एक अलसाई सी औरत थी , जो थोड़ी देर पहले ही सोकर उठी थी , उसके बदन से आती पसीने की बदबू चीख चीख कर कह रही थी ....की .... उसने सुबह का स्नान अभी तक नहीं लिया था....
सुनील के जाने के बाद , वह और मैं वहां रह गए , अचानक उसकी आँखे से शरारत के शोले चमकने लगे , अब उनसे आंसू ऐसे गायब थे , जैसे गधे के सर से सींग ,उसने इक बड़ी सी अंगड़ाई ली और मुझ पर एक मस्त भरी नजर डाली , फिर उसने मुझसे से कहा अन्दर चलो ....
उसके इस बदले वयवहार से , मै जैसे जड़ सा हो गया , मुझे समझ ना आया , की अभी थोड़ी देर पहले , यह अपनी पति की बेवफाई पर ढेर आँसू बहा रही थी , अब यह पुरे प्रोफेशनल तरीके से मुझे बहला रही है .....
उस दिन मैंने जाना ...की .....
“वक़्त के साथ , रंग बदलने की कला , गिरगिट ने , जरुर किसी नारी से ही सीखी होगी”.....
वह मुझे, अपने साथ फ्लैट के बैडरूम में ले गई , मैं डरता और कांपता हुआ उसके साथ हो लिया , मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था ....अब मुझे समझ आ रहा था ...की...
नारी के बारे में पढ़ना और डिस्कस करना, एक अलग बात है पर उसका भोग करना दूसरी बात.......
जिसके बारे में सोचने भर से मेरा कंठ सूखने और शरीर तनाव से कांपने लगा , एक तरफ मेरी मर्दानगी मुझे चुनौती दे रही थी , तो दूसरी तरफ , घबराहट मेरे जिस्म की परीक्षा ले रही थी , दोनों की लड़ाई में ,मेरा शरीर, पसीने पसीने हुआ जा रहा था....
उसके बेडौल शरीर और निकलते पसीने की बदबू से ,मुझे मितली सी आ रही थी , पर उस वक़्त नारी का शरीर, मेरी इच्छाओं और सपनों पर भारी हो गया , आखिर, वह उस वक़्त, दुनिया का वह अजूबा थी ... जो....
“किसी भी मर्द की मर्दानगी को ठंडा करने या किसी लड़के को मर्द बनाने की कुव्वत रखती थी” ...
यह और बात थी की ,उसके रंग-रूप और शरीर मे , मेरे लिए , किसी भी तरह का आकर्षण नहीं था ....
डर और रोमांच से मेरा दिल जोर जोर से धडक रहा था , किसी औरत के साथ अकेले होने का यह मेरा पहला अवसर था ....मैंने उसे ऊपर से नीचे देखा और अपना जी कड़ा करके कहा ... क्या तुम कुछ मेकअप वगैरह नहीं करोगी ?....
कई बार किसी खास बाजार से गुजरते हुए, मैंने धंधे वाली औरतो को देखा था , वो सब बहुत ही गहरे से मेकप में होती थी और फिल्मों में भी धंधे वालियों को गहरे मेकअप में ही दिखाया जाता था ..मैंने मन में सोच ...अरे ... यह तो नहाईं धोई भी नहीं है और उसपे इस गंदे से गाऊन को ही पहने हुए है , उसने मेरी बात को सुन मजाक में उड़ा दिया और बोली , "अरे मैन”... कैसा मेकअप?
“तुम हमको फ़क करना मांगता है की हमारी फोटो खीचना ?".....
फिर उसने ,मेरा दिल रखने के लिए ,अपना चेहरा, दरवाजे पर लटके, एक परदे से रगड़ कर कहा , चलो अब तो चेहरा साफ़ हो गया और ऐसा कह उसने अपना गाउन निचे सरका दिया ....
उसके गाउन का नीचे गिरना था , की उसका शरीर अपनी प्राकृतिक अवस्था में आ गया..... आज जीवन में पहली बार किसी नारी को इतने करीब से प्राकृतिक अवस्था में देखना नसीब हुआ था....
उसके नंगे बदन को देख ,मेरा शरीर उत्तेजना में काँपने लगा , जहां थोड़ी देर पहले, उसे देखने भर से , मुझे मितली आ रही थी , अब खाली शरीर देखने भर से , मेरा शरीर तनाव में अकड़ने लगा , उसने मुझे इक गहरी कामुक नजर से देखा... जैसे कोई भेड़िया, मेरे जैसे नए मेमने को हजम करने की चाहत में हो , उसकी सांस ,सेक्स के आवेग में तेज तेज चलने लगी और मैं जन्म जन्म का भूखा , उस सड़े मॉस के लोथड़े को खाने के लिए बेहाल हुआ जा रहा था ....
वह मेरे करीब सरक आई , मैं भी, उसके शरीर के पसीने की बदबू और बेतरबी से फैले मोटापे की परवाह किये बिना उससे लिपट गया ....मेरी हालत उस आदमी की तरह थी ...
“जो थोड़ी देर पहले एक गंदे नाले को देख नाक मुंह सिकोड़ रहा था , अब अपनी, प्यास बुझाने के लिए उसमे ही कूदने को बेताब था”....
आदमी की फितरत भी अजीब है , वह अपनी मर्दानगी की प्यास बुझाने के लिए ,किस हद तक, किसी गंद में गिर सकता है , उसका पता उसे गिरने के बाद ही चलता है ?.....
उसके शरीर से लिपटा ही था , की उसके शरीर से पसीने की बदबू का एक झोका आया , जिसने मेरे अरमानो को डिगाने की एक असफल कोशिस की , पर मैं भी उसके शरीर से लिपटा , उसके उभारो को बेतरबी से मसलने और चूमने लगा ...
उसने मुझे अपने करीब खिंचा और बिस्तर पर अपने साथ धकेल लिया ...मैंने एक ही झटके में अपने सारे कपडे अलग कर दिए और उससे लिपटता गया ... बिस्तर पर लिपटे हम दोनों को , अभी , मुश्किल से कुछ सेकंड ही हुए थे , की कमरे में चलता हुआ पंखा , झटके से रूक गया... गर्मियों के दिन थे , उसपर वह सुबह से नहाईं भी ना थी , अब बिजली भी चली गई , उसका शरीर पसीने से लथपथ हो चूका था , इतना सब होने के बाद भी , मैं जैसे, उसके शरीर को छोडना ही ना चाहता था , उसके मुंह से अब मीठी मीठी सितकारे निकलने लगी थी ....
अचानक मेरा शरीर पसीने से भर उठा और मुझे अब, उसे छुने भर से उबकाई आने लगी , शायद मैंने अपनी मंजिल , बिना सफर की शुरुवात किये ही पा ली थी ... मैं बिस्तर से उठकर , कमरे में खड़ा हो गया और बोला , इतनी गर्मी में तो , यह सब मुझसे ना हो सकेगा?
उसका शरीर भी, पसीने से सरोबर हो चूका था , वह ऐसे ही लेटी रही और मेरे नंगे शरीर का मुआयना करते हुए बोली , मैन , लगता है तुमको अभी कुछ और वक़्त मांगता है ....
मैं अपनी झेंप को मिटाते हुए बोला , हाँ इतनी गर्मी में , मुझे तनाव नहीं हो पा रहा , शायद गर्मी और घबराहट से ऐसा हो रहा है , मेरा तो यह पहला टाइम है ... उसपर उसने हँसते हुए कहा , कोई बात नहीं , अभी और कोशिस करो , शायद यह तैयार हो जाये ... उसके सामने मैंने कई बार असफल कोशिस की , पर वह होना नहीं था , क्योकि , मैंने अपनी सारी मर्दानगी तो ,पहले ही उसके बिस्तर पे खाली कर दी थी ....अब उसमे ऐसा कुछ शेष ना था , जो मुझे द्वारा से इतनी जल्दी जोश दे पाता ...
तभी बहार से सुनील की आवज आई , बॉस हो गया क्या ? मैं बोला यार , यहां तो गर्मी की वजह से कुछ हो ही नहीं पा रहा , वह भी बिस्तर से उठ गई और उसने गाउन को अपने शरीर पर डाल लिया ...
तभी सुनील का कमरे में प्रवेश हुआ , उसने देखा, कमरा गर्मी और हम दोनों के पसीने की बदबू से बेहाल था ... वह बोला , लगता है बिजली आने तक रुकना पड़ेगा ,इस कमरे में तो कुछ होना मुमिकन ही नहीं , लगता है अभी तक कुछ हुआ ही नहीं है ?
अचानक रोनी की बीवी की नजर बिस्तर पे पड़ी और वह जोश में बोली , नो मैन , डिस्चार्ज तो हुआ है , उसने बिस्तर पर पड़े, एक बड़े से धब्बे की तरफ इशारा किया , बेड को इधर से ! देखो मैन.......
अब , इसके आगे, किसी को कुछ कहने या सुनने की कोई जरूरत नहीं पड़ी , सुनील ने उसके कान में कुछ कहा और बोला , अच्छा बाद में देख लेंगे और ऐसा कह हम दोनों, उस फ्लैट से बहार आ गए ....
मेरी हालत अजीब थी , कल तक जो बड़ी बड़ी बाते करता था , दुनिया जहां के उपदेश लोगों को देता था , लोगो की सेक्स समस्याओ के हल देता था ,आज वह अपनी बारी आपने पर , पहले ही राउंड में , पहले ही पंच पर नाक आउट हो गया था ...
रास्ते में सुनील ने मुझे हौंसला देते हुए कहा , बॉस चिंता की कोई बात नहीं , पहली पहली बार, सबके साथ ऐसा ही होता है , मुझे पता था , वह जो कह रहा है , ठीक है ...पर .. दिल था की मानता ही नहीं था ...वह बार बार एक ही बात अपने आप से कहता था ...की ....
“घोड़ियो के बारे में किताबी जानकारी लेने से , कोई भी घुड़सवार नहीं बन जाता”
और उस दिन तो , मुझे तो घोड़ी ने ,अपने ऊपर चढने से पहले ही, नीचे गिरा दिया था......
क्रमश :......
By
Kapil Kumar
Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely coincidental.' ”
Sunday, 13 December 2015
नारी की खोज---5
अभी तक आपने पढ़ा (नारी की खोज भाग –1 , 2 , 3 और 4 में ) ...की मैंने बचपन से आज तक नारी के भिन्न भिन्न रूपों को देखा .......मेरे इस सफर की आगे की कहानी.....
गतांक से आगे .......
किसी इन्सान को परखने के लिए उसके बारे में तीन चीजे जानना जरुरी है , उसका व्यवहार , स्वाभाव और चरित्र .... इन्सान जिस माहौल या समाज में रहता है या पला बड़ा होता, वह उसका व्यवहार तय करता है , इन्सान जैसी परवरिश पाता है, वह उसका स्वाभाव तय करता है और ऐसे ही कोई इन्सान बचपन में कैसा साहित्य पढता है उसके कैसे मित्र और संबंधी रहे है, वह उसका चरित्र निर्धारित करते है .....
बचपन से मैंने सेक्स से सम्बंधित साहित्य और एडल्ट पत्रिकाएं पढ़ी थी , पर वे सब किस श्रेणी के थे इसका पता मुझे कॉलेज में आकर लगा , जब लड़के आपस में कानाफूसी करते और कहते , लगता है बॉस ने “मस्तराम” बहुत पढ़ा है .... मुझे समझ ना आता की यह लोग किस संदर्भ में बात कर रहे है ...यह मस्तराम क्या बला है ?
मैं उनसे जिन जिन किताबो की या पत्रिकाओ की बात करता , वह तो उन्होंने कभी पढ़ी ही ना थी या सुनी ही ना होती ... ऐसे ही एक दिन, बातों ही बातों में मेरे हाथ किसी पढ़ाकू लड़के के कमरे में मस्तराम की किताब हाथ लगी ..... उसके कमरे में उस किताब को देख मेरा भेजा घूम गया , मुझे कभी उम्मीद भी नहीं थी कि पढने में इतना तेज , स्वभाव का इतना शर्मीला लड़का भी ऐसी किताबो का शौक़ीन हो सकता है ?
मैं समझता था , ऐसी किताबें तो हमारे जैसे घुटे हुए या आवारा और अय्याश किस्म के लोग ही पढ़ते होंगे , उस दिन पता चला की नारी तो सबके आकर्षण का केंद्र होती है , उससे किसी मर्द की पर्सोनालिटी या स्वाभाव का कोई लेना देना नहीं , मेरा एक मिथ क्लियर हुआ की , जो जैसा दीखता है , वह कैसा होगा , उसकी कल्पना तो उसे परखने के बाद ही होती है ...
मैंने भी एक बार का शौक पूरा करने के लिए मस्तराम वाली किताब उस लड़के से ले ली , जो उसने बड़े झिझकते हुई दी और बोला , की मुझे उस किताब को पढने की क्या जरुरत है ? उसे पढने के बाद मुझे समझ आया ...की सेक्स का ज्ञान , हमारे समाज में क्यों वर्जित है? सेक्स सम्बंधित किसी बात को कहने का तरीका भी इतना घटिया दर्जे का हो सकता है , यह मैंने मस्तराम के कुछ पेज पढ़कर जाना ...उसे पढने के बाद , सेक्स एक घटिया शब्दावली का खेल भर लगा , जिसे एक सभ्य इन्सान अपने जीवन में शायद ही अपनी प्रेमिका या पत्नी के सामने बोल सकने की हिम्मत कर सके ..... अजीब बात यह थी , कॉलेज में अधिकतर लड़के , मस्तराम की तरह की पत्रिकाओं के बारे में ही जानकारी रखते और पढ़ते थे .....
उन्हें सेक्स के ज्ञान और अज्ञान में क्या फर्क होता है शायद ही मालूम था , उन्हें तो सिर्फ स्त्री और पुरुष की कामलीला से मतलब था ....कुछ लोगों ने कामसूत्र के बारे में तो सुना भर था , पर पढ़ा शायद किसी ने ही था ...
कॉलेज में मेरे ज्ञान के जो चर्चे थे , शायद मेरे मित्र भी उसी श्रेणी के तय हो गए या ऐसे लोग मेरी तरफ खींचने लगे जिन्हें ऐसे विषय में आनंद आता था , अब यह और बात थी की इस बारे में कोई अपनी राय खुलकर कभी नहीं देता था .... बड़े से बड़ा पढ़ाकू और शर्मीला , दबे छिपे मुझसे इधर उधर की बातें पूछ ही लेता ....पर मौका मिलने पर , दूसरों के आगे , मेरा चरित्र हनन करने से बाज ना आता.... बड़ी अजीब बात थी , विगत में मेरे जितने भी दोस्त हुए थे , वे सब पढ़ाकू किस्म के , शर्मीले और स्वाभाव से गंभीर थे । मैंने कभी किसी आवारा या लफंगे टाइप लड़के से दोस्ती की ही नहीं , पता नहीं क्यों , मुझे उन्हें देख एक घिन्न सी आती ..... उनकी सेक्स के बारे अधकचरी बाते , लडकियों को खुले आम छेड़ना और पढाई के नाम पर मास्टरों की गाली खाना या सजा पाना उनकी फितरत थी ....जो मेरे स्वाभाव से मेल नहीं खाती ....
ऐसे ही कॉलेज में , मेरा एक दोस्त सुनील था , सुनील का व्यक्तिव मुझसे अलग था , मैं एक वाचाल और फुर्तीला किस्म का इन्सान ,तो, इसके विपरीत वह एक गंभीर और सुस्त किस्म का प्राणी था ... कॉलेज में जब लड़के, लडकियों के इंतजार में पलके बिछाये कैंटीन या लाइब्रेरी में बैठे रहते , तो वह उन्हें देख बड़ा मजाक बनाता ... कभी कभी मेरे अन्दर के अरमान भी मचल जाते और मैं भी किसी एक खास लड़की की दीवानगी में पड़ उसके साथ बातचीत का बहाना बनाने की जुगत में लग जाता ...
जब जब सुनील को पता लगता की मैं इस कोशिश में हूँ तो, उसका एक ही जवाब होता “अरे बॉस , काहे अपना समय बर्बाद करते हो , इन दो टक्के की लडकियों के लिए , इनकी कीमत १०० रूपये से ज्यादा की नहीं” , इससे ज्यादा महत्वपूर्ण तो हमारा इंजिनियर बनना है , काहे इनके चक्कर में पड़कर, अपना पढाई का समय बर्बाद करते हो .... मैं उससे पूछता , “क्या तेरा मन नहीं होता , की तू उनके साथ गप्पे लड़ाए , मूवी जाए या किसी को अपनी गर्लफ्रेंड बनाये ?”.....
इस बात पर वह हंस देता और बोलता , जितना समय और पैसा इनका थोडा सा साथ पाने के लिए करूँगा , उससे कहीं कम में तो ,मैं इनका पूरा का पूरा मजा ले सकता हूँ ... फिर काहे इनकी झूठी सच्ची बाते सुनने और ज्यादा से ज्यादा छूने छाने के लिए , मैं अपना दिमाग , पैसा और समय बर्बाद करूँ?....
उसकी बातों में लॉजिक होता , क्योंकि जिन जिन लड़के और लडकियों के चक्कर चल रहे होते , उनका अधिकतर समय एक दूसरे के इन्तजार में या फालतू के लफड़ों में पड़कर ही बर्बाद होता और इसके साथ कॉलेज के टीचर्स की भी उनपर ख़ास इनायत रहती की, उन्हें किस बहाने से फ़ैल किया जाए ....
ऐसे हालत में , मैं भी मजबूरन ,लडकियों के पीछे भागने के ख़्यालात को छोड़ देता , अब यह बात अलग थी, हमारे नसीब में ना तो सुनील की तरह की ऐश थी ना ही दुसरे मजनुओं की तरह किसी के साथ वक़्त गुजारने की दीवानगी । इस तरह के झूठे और सच्चे आदर्श के चक्कर में पड़कर , मैंने भी अपने अंदर एक अजीब तरह की अकड़ पा ली , की किसी भी ऐसी वैसी लड़की को कभी घास नहीं डालनी है ....
जिन जिन लडकियों ने मुझे कुछ कुछ इशारा दिया , उन्हें मैंने हड़का दिया और जिन्हें मैंने चाहा , वे हमें आँख उठा कर देखती भी नहीं थी । इस फालतू की अकड़ का यह परिणाम निकला , की हम, ना तो घर के रहे , ना घाट के और फ़ालतू में अपनी चढ़ती जवानी को नारी के सपने देख और बचपन में पाए अपने अधूरे ज्ञान के साए में , अपना मर्दों वाला काम चलाने पर मजबूर थे ... मेरी बदहवासी या मायूसी देख एक दिन सुनील ने मुझे नारी के असली दर्शन करवाने या यूँ कहे की मेरी थ्योरी को प्रक्टिकल में बदलवाने के लिए अपने गावं आने का न्योता दिया ....
कॉलेज का तीसरा साल ख़त्म हो रहा था , गर्मियों की छुट्टी के लिए सब घर जा रहे थे । मैंने सुनील से वादा लिया की , जब मैं उसके गावं आऊंगा तो वह मेरी अतृप्त इच्छा की पूर्ति जरुर करवाएगा ... सुनील ने बड़ी ही शान से ताल ठोकी और बोला , “बॉस , तुम आने वाले तो बनो” , देखो मैं तुम्हारी कैसी ऐश करवाता हूँ और ऐसा कह उसने अपने खीसे निपूर दिए ....
हम सब दोस्त अपने अपने घर गर्मियों की छुट्टी बिताने चले गए , हमारा इंजीनियरिंग का तीसरा साल खत्म हो चूका था , घर पर आकर , इधर उधर घूमना और सोना मेरा शगल था ....की ..एक दिन मैंने सोचा , अगर इस साल सुनील के गाँव नहीं गया तो फिर कभी जाना नहीं होगा , अगले साल तो सब पास करके नौकरी में इधर उधर चले जायंगे , क्यों ना इसा बार प्रक्टिक्ले कर ही लिया जाए ....
प्रक्टिकल के ख्याल भर से ही शरीर में उत्तेजना होने लगी , दिल जोर जोर से धडकने लगा , की कैसा अनुभव होगा ? मैंने तुरंत फुरंत सुनील को चिठ्ठी लिखी की मैं दो हफ्ते बाद उसके गावं आऊंगा । वह जबाब देकर मेरा आना पक्का करे ...उस ज़माने में ना तो फोन था और ना ही कुछ और जरिया की , आप किसी से मिलने का प्रोग्राम अचानक से बना ले ...
कुछ दिन बाद सुनील का जवाब आ गया और मैंने उसके गाँव जाने की तैयारी शुरू कर दी ....रास्ते भर , ना जाने कैसे कैसे सपने संजोता रहा , की जब किसी औरत को बिना वस्त्रों के देखूंगा तो वह कैसी लगेगी ?...
उस ज़माने में कॉलेज में लड़के किराये पर टी वी , वी सी आर लाते , जिसमे कुछ हिंदी , कुछ अंग्रेजी की और फिर आधी रात के बाद चोरी छिपे नीली फिल्मो का दौर चलता , पर वह सब इतनी साफ ना होती की उनसे किसी तरह का कोई अंदाजा लगाया जाए ...इसके विपरीत आजकल जो सुविधा , एक आम बच्चे को इन्टरनेट पर उपलब्ध है ...ऐसी तो हमने अपने समय में सपनों में भी ना सोची थी ...
पत्रिकाओ के नाम पर ,प्लेबॉय नाम की कोई पत्रिका होती है जिसमे औरतो के गर्म गर्म फोटो होते है ऐसा सुना भर था , पर देखना कभी नसीब नहीं हुआ ...ज्यादा से ज्यादा उस ज़माने में किसी के पास डेबोनैर मिल जाती थी , जिसपर कॉलेज में लड़के चील कौओ की भांति टूट पड़ते थे , या कुछ लोग उसे अपनी मर्दानगी से गन्दा करके रखते थे ...की ..दूसरा उसे छूने से पहले कई बार सोचता ....मुझे आजतक यह बात कभी समझ नहीं आई , की लडको को किसी स्त्री की फोटो से अपने अंग को रगड़ ने से , कैसे भला किसी आनंद की प्राप्ति हो सकती है ? फिर भी जिन जिन लडको के पास कोई भी मजेदार पत्रिका होती , उसमे कुछ पन्ने जरुर चिपके होते .....
अगर गौर से देखे तो भारत में मेरे समय के लोग बहुत ही बदनसीब थे ...हमसे पहले वाली पीढ़ी(नाना , बाप , दादा ) को सेक्स का अनुभव कच्ची उम्र में शादी के माध्यम से होजाता और आज के युवा को इसकी खुली छुट की वजह से हो जाता है ...पर हम लोग , जिन्होंने ना तो कच्ची उम्र में शादी की और जिन्हें, ना ही आज के माहौल के हिसाब से सुविधा और खुलापन मिला .....वे सेक्स के लिए अपनी किस्मत के रहमो करम पर थे ...की कहीं किसी अंधे के हाथ बटेर लगी की नहीं ...
यूँ तो सुनील के घर पहुचने का प्रोग्राम मैंने उसे लिख दिया था , पर जब मैं उसके घर पहुंचा तो , वह मुझे देख हैरान हो गया और बोला , बॉस कैसे आना हुआ ? अब चौंकने की बारी मेरी थी , मैं बोला , तुझसे कॉलेज में बात तो हुई थी और मैंने चिठ्ठी लिखकर तुझे बताया था , की मैं आऊंगा ....
उसने अपने खींचे निपोरे और बोला , हाँ एक चिठ्ठी तो मिली थी जिसमे आने का जिक्र था , पर दिन और तारीख मैं भूल गया , फिर मुझे लगा , लगता है बॉस ऐसे ही गोली दे रहे है , भला इतनी दूर कौन आएगा ?... पर उसे क्या पता था , की मैं भी इरादों का बड़ा पक्का था ...
उसके घर पहुचने के बाद मैंने अपने इरादे जाहिर कर दिए ...की भाई , थ्योरी बहुत पढ़ ली अब जरा प्रक्टिकल का लिया जाए ..पर मुझे क्या पता था , जो बाते पढने में जितनी रूहानी होती है , सुनने में जितनी मजेदार लगती है , जब हमारा असलियत से पाला पड़ता है , तब सिवाय निराशा के कुछ हाथ नहीं लगता ....जिस दिन मैं सुनील के घर पहुंचा , उस दिन शाम हो चुकी थी । वह बोला आज तो कुछ हो नहीं पायेगा , कल चलते है.. । मैंने भी दिल को तसल्ली दी , जब इतना वक़्त इंतजर कर लिया तो एक दिन और सही .....
.......क्रमश :
By
Kapil Kumar
Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely coincidental.' ”
Thursday, 10 December 2015
नारी की खोज---4
अभी तक आपने पढ़ा (नारी की खोज भाग –1 , 2 और 3 में ) ...की मैंने बचपन से आज तक नारी के भिन्न भिन्न रूपों को देखा .......
मेरे इस सफर की आगे की कहानी..... गतांक से आगे .......
लड़कपन में भी एक अजीब
सा नशा होता
है जैसे शराब
जितनी पुरानी हो उतना
ही नशा देती
है ....वैसे ही
जवानी ...जितनी ढलती जाती
है आदमी की
प्यास उतनी बढती
जाती है ....ढलती
उम्र के लोगो
को कमसिन बदन
की चाहत होती
है ... ना जाने
क्यों हर आदमी
अपनी उम्र से
हमेशा नाराज रहता
है ....जब हम
बच्चे होते है
तो बड़ा बनना
चाहते है और
जब बूढ़े होने
लगते है तो
जवानी हिल्लोरे लेने
लगती है ... ऐसा
ही कुछ मेरे
साथ था .....
बचपन से जवानी
तक मुझे भरी
पूरी औरतो में
इक आकर्षण दिखता जो
अपनी हम उम्र
लडकियों में कभी
नहीं दिखा ....उस
वक़्त जो औरतें नयी
नयी शादीशुदा होती , उनका भरा
हुआ जिस्म , भरे
उभार और गदराता
योवन , जिस्म में इक
मीठी सी आह
भर देता ...
किसी की नयी
नवेली दुल्हन को
देख , जिस्म में
अचानक इक मीठी
सी अंगड़ाई करवट
लेने लगती और
अरमान जैसे बेकाबू
होकर मचलने लगते,
पर यह समझ
ना आता , यह
क्यों हो रहा
है ?.... इसके विपरीत
अपने साथ पढने
वाली मासूम , कमसिन
, कच्ची कलियों में जैसे
आकर्षण दिखता ही
नहीं था .... मैं
सोचता , शायद मैंने बचपन
में औरतो के
प्रति अलग नजरिया
रखा था या
मेरे अनुभव अलग
थे ...इसलिए मेरे
साथ ऐसा हो
रहा है ...पर
ऐसा ना था
..उस वक़्त मेरे
दोस्तों और हम
उम्र के लडको
के ख्यालात एक से
थे ... सबको नई
नई शादीशुदा आंटियों में
ही दिलचस्पी होती
थी .... कुछ बड़े
लड़कों के
तो हम दबे
छिपे किस्से भी
सुनते थे ...पर
समझ कुछ नहीं
आता था ...की
वह आकर्षण
क्या है ? एक लड़की
और औरत में
क्या फर्क है
?
आज उम्र के
इस पड़ाव पर
पहुँच कर सोचता
हूँ तो हंसी
आती है .... की
... आम आदमी को
अपने लड़कपन में
अधिक उम्र की
औरतो से और
अधेड़ या बुढ़ापे
में आदमी को
कमसिन लड़की की
चाहत क्यों होती
है ? शायद जो
जिसके पास होता
है वह उससे उबा
हुआ होता है
.....
बचपन में हमारे
आसपास कमसिन और
नादान लडकियो का
झुण्ड होता है
.... तो
हमें उनमे
कोई आकर्षण नजर
नहीं आता...वहीँ पक्की
उम्र में पकी
हुई थकी हुई
, सेक्स से बेज़ार औरत
दिखतीं है
...जिन्हें आदमी चाह
कर भी नहीं
देखना चाहता ... उस
वक़्त उसे कमसिन
, इठलाती हुई , मासूम लडकियों
में अपने लडकपन
की यादो का
मंजर देख, एक ऐसे
जोश का संचार
होता है ...जो
उसकी ढलती जवानी
और ढीले पड़ते
बदन में नयी
उर्जा का संचालन
कर सके ...
उस ज़माने में मुझे
उभरती और गदराती
औरतों को
देख एक अनजानी सी ख़ुशी
मिलती , उनके भरे
भरे उभार दिल
को धड़का देते
... इसी रहस्य की खोज
में मैं अपने
घर और आसपास
में युवा होते
आदमियों को गौर
से देखता , की
वह शादी
के बाद क्यों
और कैसे खिलखिला
कर रहते है
... उनकी बीवियों ने उन्हें,
ऐसा क्या दे
दिया या उनमें ऐसा
क्या है ? जो
कल तक एक खडूस
भाई साहब होते
थे, वोह अचानक
एक स्वीट
अंकल कैसे बन
गए ?...
फिर उनकी बीबियों यानी
हमारी भाभीयों के
लज्जाते चेहरे, शर्माती आखें
और परफ्यूम की खुशुब
से महकता बदन
, एक अनोखा
सा आकर्षण पैदा
करता ..... उनका
मुस्कुराना , इठलाना और शर्माना
, जिस्म में कहीं
एक मीठी
सी कसक पैदा
करता ... इन सबसे
अलग अपनी हम
उम्र की लडकियों
में यह सब
ना दिखता ...वह
तो जुबान की तीखी , हरकतों
से लड़ाकू और
बे सलीके से
रहने वाली लगती ....
इसके विपरीत नयी नवेली
दुल्हन , हमेशा सोलह श्रृंगार
में होती .. जब
पकवानों की थाली
सामने हो तो
,कोई सादी रोटी
और दाल कैसे
पसंद करे ? उसपर मेरा
जैसा भंवरा , जिसे
बचपन में ही
फूलो को सूंघने
की आदत पड
चुकी थी , उसमे
इतना धैर्य कंहा
था ...की वह
किसी कली के फूल
बनने का इंतजार
कर सके ?....
भाभियों के आकर्षण
से बंधा , मैं
भी उनकी झलक
पाने किये गाहे
बगाहे उनके घर
के चक्कर मार
लेता ....मेरा अपने
अड़ोस पड़ोस के कुछ
घरो में बचपन
से ही आना
जाना था ...हमारा
पूरा परिवार
एक ही
मोहल्ले में कई
सालों से एक साथ
रह रहे थे
और कुछ भाईसाहब
और मैं तो
आपस में एक दुसरे
को देखते हुए ही
बड़े हुए थे
...इसलिए किसी के
घर, कोई भी
, बेधडक होकर आता
जाता रहता था
... इसलिए मैं भी
उनके घर कभी
कभार झांक
लेता ...की.. भाभी
, चाची , बुआ कोई
काम वाम हो
तो बता देना
, इसी बहाने हम
जैसे प्यासे भंवरो
को भाभियों की
सुन्दरता को देखने
का नयन
सुख मिल जाता
....
ऐसी ही एक दिन
, मैं अपने किसी
पड़ोसी के
घर में किसी
काम से गया
... उन्ही दिनों , उस घर
में रहने वाले
एक भाईसाहब
की नयी नयी
शादी तय हुई
थी । घर के
लोगो को किसी
काम से बाहर जाना
था , तो वे
लोग मुझे , घर की
देखभाल के लिए
चाबी दे गए
... चहल कदमी करने
के लिए मैं
घर में इधर
उधर घुमने लगा
और यूँही घूमते
हुए , एक कमरे में
देखा ....की ... वहां कुछ किताबे
पड़ी हैं .....
मैंने भी
टाइम पास करने
के लिए वे किताबें उठा
ली ...उन किताबों के
कवर पेज को
देख मेरी सांस
तेज चलने लगी
और जिस्म में
एक तीव्र
लहर सी उठने
लगी ...उन किताबो
में स्त्री पुरुष
, अजीब सी अवस्था
में थे ...
जवानी ने देहलीज़ पर
कदम भर रखा
था , अब तक
लडकियों को देखा
था और औरतो
के जिस्म में
आकर्षण महसूस किया था
...पर यह क्यों
और कैसे होता
था , इसका पता
शायद उस वक़्त
नहीं था ..पर
उन किताबो में
जैसे मेरे सारे
प्रश्नो के उत्तर
और जिस्म से
उठने वाली जिज्ञासाए
के अर्थ समाये हुए थे
...
उनमे इक किताब
वात्स्यान का कामसूत्र
,दूसरी डॉक्टर कोठारी की सेक्स
और समस्याए और
तीसरी कोई एडल्ट
पत्रिका थी
जिसमे कुछ कहानियाँ उत्तेजक
फोटो के साथ
थी ...
इन सब को
देख , मुझे लगा
जैसे इक जैकपॉट मेरे
हाथ लग गया
...कहाँ तो
मैं वहाँ रुकने के नाम
से ना नुकुर
कर रहा था
...की वहाँ क्या करूँगा
? उस ज़माने में
टीवी तो हर
किसी के घर
होता नहीं था
और रेडियो के
गाने भी कुछ
वक़्त ही सुनाता
था ...इसलिए खाली
घर में टाइम
काटना भी अपने
आप में एक बड़ा
काम था ...
मेरे पास वक़्त
ही वक़्त था
, उन लोगो को
देर रात आना
था और मुझे
वहीं पर रूक
कर सोना भी
था , इसलिए मैंने अपना
बिस्तर लगाया और सारी
किताबें अपने
पास रखी और
लग गया अपने
ज्ञान को बढाने
में ...
जब आप किसी
विषय को मज़बूरी
या जरुरत के
नाते पढ़ते है
तो वह आपको सर
दर्द देता है
...इसके विपरीत आप उसे
एक जिज्ञासा
की वजह से
पढ़ते हैं तो
वह आपको
ज्ञान के साथ उत्तेजना
, मनोरंजन और आनंद
देता है ... अगर
इतनी सारी मेरी कोर्स
की किताबें होती तो
शायद मैं उन्हें
पुरे साल भर
में भी नहीं
ख़त्म कर
पाता ..जो उस
दिन मेने 5 या
6 घंटो में पढ़ा
ही नहीं बल्कि
उसे अपने दिमाग
और याददाश्त में
हमेशा हमेशा के
लिए बैठा लिया ...
जो भाई साहब
वे किताबें लाये
थे , पता नहीं
उन्होंने उसे कितनी पढ़ी
या समझी थी
....पर मैंने तो
उन्हें पूरी घोट
लीं । पहले
मैंने एडल्ट
पत्रिका की कहानियाँ पढ़ी
...उसकी कुछ कहानियां
पढने और चित्र
देखने भर से
,मेरे जिस्म में
एक अजीब
सी गर्मी भर
गई , जो औरत
कल तक सिर्फ देखने भर
का आकर्षण थी
, उसकी अब मुझे
जैसे तीव्र जरुरत
महसूस होने लगी
, उस वक़्त समझ
आया ....की आदमी
का औरत के
प्रति आकर्षण का
क्या राज है ?
उस वक़्त मेरा
जिस्म किसी भट्टी
की तरह तप
रहा था , समझ
नहीं आ रहा
था , इस जिस्म
की आग को
बुझाऊं तो
कैसे बुझाऊं ? इसी सोच
में पड़े पड़े
.... ना जाने कैसे
मेरा एक हाथ , शरीर के
उस भाग से
खेलने लगा और
कुछ ही देर
में वह हाथ अपनी
मंजिल तक पहुंच
गया ..इसके बाद
मुझे एक ऐसे आनंद
की प्राप्ति हुई
, जो उस वक़्त
अकल्पनीय थी ...मैं कुछ देर
के लिए , जैसे
इक मीठे सपने
में खो गया
....मुझे लगा मैं
कितना स्मार्ट हूँ
, जिसने अपने आनंद
का एक नया और
अनोखा तरीका खोज
निकाला है ...पर उस
वक्त मुझे क्या
पता था ...की
यह प्रकृति है । जो
हम सबको अपने
अपने तरीकों से आदम
और ईव के
सम्बन्ध समझा देती
है ....
मुझे जाने अनजाने
अपनी मंजिल तो
मिल गई ... पर
उसके बाद , कपड़ो
पर हुए गीलेपन
से एक अनजाना सा डर
सताने लगा ...अरे
मैंने यह
क्या कर दिया
? कहीं
मैंने कुछ
काट तो नहीं
लिया , जिसकी वजह से
खून की जगह
सफेद मवाद निकला
हो ?... पर दिमाग
कहता ...अगर कुछ
कटता तो दर्द
होता , पर यह
तो दर्द दे
ही नहीं रहा
...फिर यह क्या
है , हे भगवन
!मैंने यह
क्या कर दिया
? इसी कशमकश में
पडे ... मैंने सोचा
, जो हुआ सो
हुआ , चलो दूसरी
किताबें पढ़ी
जाए ....
शायद उस दिन,
मेरा उस घर
में रुक कर
उन किताबो को
पढना , मेरा पहला
अनुभव करना और
उसे समझने का
कारण , आने वाले
दिनों में , मुझे
“ kk बॉस” की पदवी
दिलाने के लिए
काफी था ...
कहानियों से
निपटने के बाद
मैंने कामसूत्र पर हाथ
साफ़ किया और
फिर सेक्स और
समस्याओं को
बड़ी गंभीरता से
पढ़ा .. कामसूत्र से तो
मुझे कुछ ज्यादा
समझ नहीं आया
...पर सेक्स और
समस्या वाली किताब
ने , मेरे उन
सारे सवालों के
जवाब दे दिए
..जो थोड़ी
देर पहले मेरे
मन में एक डर
और जिज्ञासा पैदा
कर रहे थे
.... की ..अरे ..मैंने यह क्या
किया था और
वह सफ़ेद
सफ़ेद द्रव्य क्या
था ?
शायद मेरी जिज्ञासा
थी या उस
वक़्त की घटना
से मैं कुछ
ज्यादा ही
आतंकित था की
, मैंने सेक्स वाली किताब
के हर पन्ने
को जैसे याद
सा कर लिया
...की ...
आदमी के अंदर,
औरत को लेकर
कैसी कैसी हीन
भावना होती है
और उसकी आम
समस्याएँ क्या
क्या होती है
और उनके क्या
क्या उपाय होते
है ?...
एक बच्चा
मर्द बनने के
सफर में किन
किन ग्रंथियों का
शिकार होता है
?.... शादी से पहले
औरत के मन
में आदमी को
लेकर क्या क्या
शंकाए होती है
?..
औरत और आदमी
के बीच सम्बन्ध
कैसे स्थापित होता
है और शुरुवात
में उनको , किन
किन समस्याओं से
दो चार होना
पड़ता है ?...
उस ज़माने में , यूँ
तो मेरे घर
में महिलाओ की
घरेलू पत्रिका गृहशोभा
, सरिता जैसी पत्रिका
आती थी । जिन्हें
मैंने उस दिन
से पहले कभी
देखा भी ना
था ... इसके
बाद तो मैं
, कोई भी पत्रिका
पढता तो , उसमे
ऐसे सेक्शन की
तलाश में रहता
, जिसमे सेक्स से सम्बंधित
लेख या प्रश्न हो
और उन्हें मैं हर
पत्रिका में जरुर
खोजता ... कभी कभी
ढूंढने से
उनमें भी
, लोगों की सेक्स
से सम्बंधित समस्याओं
के बारे में
कोई ना कोई
आर्टिकल मिल ही
जाता , नहीं तो
कोई प्रश्न मंच, जिनमें ऐसी
किसी ना किसी
ऐसी बात का
जिक्र होता , उस
वक़्त , वे
लेख और स्तम्भ
मेरी पहली पसंद
होते , जिन्हें मैं बड़े
ही चाव
से पढता ...
गुजरते वक़्त के
साथ मैं बच्चो
की पत्रिकाओ और
कॉमिक्स से कोसो
दूर होता गया
और सिर्फ इस
तरह के साहित्य
में रूचि लेने
लगा ... कहाँ मेरी
उम्र के बच्चे
,लडकियों के साथ
खेलते , कूदते .. पर मेरी
नज़रें तो
उनके शरीर में
कुछ टटोलती , जिन्हें
जवान होती लडकियों
की नजर तुरंत
फुरंत पहचान लेती
और फिर मुझे
उनके साथ खेलना
नसीब ना होता
...
उन बातों को
समझने और पढने
की मेरी भूख
बढती ही जा
रही थी । अब
समस्या यह थी
की पढने के
लिए मेरे पास ऐसी
किताबे और पत्रिकाएं उपलब्ध
नहीं थी
, महिलाओं की
घरेलू पत्रिकाओ में पढने
लायक ज्यादा कुछ
ना होता .... मेरा
चंचल मन उन
चीजो को बार
बार पढना और
समझना चाहता ....
आने वाले दिनों
में उस समस्या
का भी समाधान
हो गया । उन
दिनों बाजार में
किराये पर
पत्रिका और नॉवेल
देने का चलन
था ... मैं भी
बच्चो के पढने
वाली बाल पॉकेट
बुक्स या कुछ
पत्रिकाए किराये पे लाता
था ...ऐसे ही
एक दिन
बाजार जाते
हुए मैं एक दुकान
से , किराये
की पत्रिका
लेने के लिए
रूक गया .. वहां
नजर घुमाई तो
देखा दुकान में
तो मेरी पसंद
का साहित्य भरा
पड़ा था .. न
जाने क्यों आज
से पहले मेने
इन्हें वहां कभी
देखा नहीं था
या मैंने गौर ही
नहीं किया था
....
उस किराये की दुकान
को चलाने वाले
का लड़का मेरा
दोस्त था । उस
लड़के का बाप
अधिकतर शाम को
, दुकान उसके हवाले
करके घर चला
जाता था , बस
उस दिन से
मैंने भी
अपना खाली वक़्त
उस दुकान में
बिताना शुरू कर
दिया । मेरे वंहा
बैठने और रुकने
से उस लड़के
को भी ऐतराज
ना था , उसे
मेरा साथ मिल
जाता तो उसका
भी टाइम कट
जाता और देखते
ही देखते वहां
पर जितनी
भी ऐसी पत्रिकाएं या
किताबें थी
मैंने वे सब कुछ
ही दिनों में
पढ़ डाली .....
जिस ज्ञान को आदमी
या औरत उस
ज़माने में अपने
अनुभव से हासिल
करते थे , मैंने
बिना अनुभव लिए
उन्हें अपने दिमाग
में जैसे जीवन
भर के लिए
बैठा लिया
....
उस वक़्त मुझे क्या पता था ..की .. एक दिन मेरा यह अनुभव ही मेरी बदनसीबी का कारण बनेगा ... जिसे घर में प्रैक्टिकल की लैब होने के बाद भी सिर्फ थ्योरी से काम चलाना पड़ेगा ... कुदरत मेरे साथ एक ऐसा खेल खेल रही है , की आने वाले दिनों में मुझे फिर से , सिर्फ किताबी अनुभव से काम चलाना पड़ेगा , शायद कुदरत ने मेरे खाते में प्रैक्टिकल की जगह थ्योरी ज्यादा लिख दी थी .... या जाने अंजाने मैंने उस थ्योरी की ज्यादा मांग की थी .....
उस वक़्त मुझे क्या पता था ..की .. एक दिन मेरा यह अनुभव ही मेरी बदनसीबी का कारण बनेगा ... जिसे घर में प्रैक्टिकल की लैब होने के बाद भी सिर्फ थ्योरी से काम चलाना पड़ेगा ... कुदरत मेरे साथ एक ऐसा खेल खेल रही है , की आने वाले दिनों में मुझे फिर से , सिर्फ किताबी अनुभव से काम चलाना पड़ेगा , शायद कुदरत ने मेरे खाते में प्रैक्टिकल की जगह थ्योरी ज्यादा लिख दी थी .... या जाने अंजाने मैंने उस थ्योरी की ज्यादा मांग की थी .....
क्रमश : …….
By
Kapil Kumar
Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are
not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely
coincidental.' ”
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