Monday, 23 January 2017

नारी की खोज –अंतिम भाग


अभी तक आपने पढ़ा नारी की खोज भाग -1 से  15 तक में ...की मैंने बचपन से आज तक नारी के भिन्न भिन्न रूपों को देखा .......मेरे इस सफ़र  की आगे की कहानी.....


गतांक से आगे .......
अगर पुरुष से किसी नारी के सौन्दर्य  की परिभाषा पूछी जाए तो , हर पुरुष उसे अपनी तरह से बनाएगा और बताएगा , पर सुन्दरता के पैमाने में हर पुरुष की सोच में नारी के शरीर को लेकर कुछ चीज सब में कॉमन होंगी जैसे , आँखें , गाल , होंठ  , बाल, उरोज़  , कमर और नितम्ब , यह और बात है की इनमे किसी को किसी विशेष से ज्यादा लगाव होता है ...

जैसे किसी को पतले सुर्ख लाल होठ तो , किसी को गुलाबी भरे हुए गाल , किसी को भारी कसे हुए उरोज़  ,तो किसी को शरबती आँखें , तो किसी को मदमाती हिरणी की चाल , तो किसी को भारी नितम्ब , तो किसी को लंबी औरत , तो किसी को लहराते रेशमी बाल आदि आदि ...कहने का मतलब यह है की हर पुरुष अपनी पसंद के हिसाब से नारी के किसी विशेष अंग से सम्मोहित होकर उसमे अपनी सुन्दरता गढ़ लेता है और फिर उस विशेष अंग की सुन्दरता के आगे नारी के शरीर की बाकी सारी चीजे नगण्य हो जाती है .....

मैं जेंटलमैन क्लब में जैसे ही घुसा की मेरी आँखे चौंधिया  सी गई जिधर नज़र  उठाओ सांचे में ढली प्राकृतिक अवस्था में एक  से बढ़कर एक  हसीन , कमसीन ,दिलकश नारी के दर्शन उपलब्ध थे , क्या गोरी और क्या सांवली या कुछ और ....यूँ तो आज से पहले मैंने  नारी को प्राकृतिक  अवस्था में देखा जरुर था , पर वह दर्शन इतने कम समय के लिए होता था की उसमे सुंदरता  या कुरूपता जैसी किसी चीज को देखना , परखना या समझना नामुमकिन था .....

क्योंकि ..... नारी के शरीर के आकर्षण में बंधा पुरुष ऐसे ही होता है जैसे बहुत दिनों का भूखा भिखारी , जो पात्र से ज्यादा रोटी पर  अपना ध्यान रखता है , भूखा भिखारी , यह नहीं देखता की , जिसने उसे रोटी दी है , वह इन्सान और जिस बर्तन में उसे रोटी मिली है वह कितना साफ़ सुथरा है , वह तो बस किसी तरह से रोटी को जल्दी से जल्दी अपने पेट में पहुंचा कर अपनी भूख को शांत कर लेना चाहता है ....

किन्तु इसके विपरीत जो इन्सान पेट भरने के लिए नहीं खाता क्योंकि भोजन उसके लिए कोई बहुत महत्वपूर्ण चीज़  नहीं है , वह इन्सान भोजन को अपनी पसंद और शान शौकत के हिसाब से खाता है , वह उसके स्वाद , परोसने के सलीके , बर्तन , सजावट आदि को देखने , परखने के बाद ही भोजन के बारे में कोई राय कायम करता है ... जैसे हम लोग किसी रेस्टोरेंट  में खाना खाते हुए करते है .....आज मैं भी ऐसे ही मुकाम पर  खड़ा था .....जहां मुझे सिर्फ अपनी इच्छा  पूर्ति के लिए सेक्स नहीं करना था ....

क्लब में दो स्टेज थे , जिनपर एक  बड़ा सा पोल और लटकने के लिए एक  समांतर बार(पैरेलल ) भी बना हुआ था ,बड़े झिझकते हुए मैं और रिकार्डो एक  स्टेज के सामने लगी रखी टेबल और कुर्सी पर पसर गए ...मेरी आँखे थी की रौशनी और हैरानी से खुली हुई थी ...अपने जज्बातों को काबू में रख मैंने  स्टेज पर  मटकती लड़की पर  ध्यान देना शुरू किया ...

वह 20/22 की उम्र की सांचे में ढली अनुपम सुन्दरी थी , जो अपनी कामुक अदाओं और नग्न जिस्म की हरकतों से लोगो के अंदर सोये मर्द को जगा रही थी , उसकी एक  झलक भर से मेरा मर्द अकड़  कर हुंकारे लेने लगा , लड़की पतली और लम्बे कद की थी इसके बावजूद उसने एक  बहुत ही ऊँचे हील की सैंडलस पहने हुए थे ,उसकी तवचा गोरे रंग की और बाल सुनहरे थे ,उसे पहली ही नज़र  में देख दिल को एक  धक्का सा लगा की इतनी खुबसूरत लड़की सरे बाज़ार अपने जिस्म की कितनी बेहूदगी से नुमाइश कर रही है...

स्टेज के बैकग्राउंड में कोई गाना बज रहा था , जिसकी धुन पर वह अपने जिस्म को बड़े ही मस्ती भरे अंदाज में उमेठते हुए थिरक रही थी , उस वक़्त उसके शरीर पर  कपड़ो के नाम पर  इक झीनी पतली सी ब्रा और योनी को ढकने भर के लिएएक  लिनग्रीन (पतली सी नाड़े की पेंटी )थी ,ब्रा उसके भारी भरकम उरोजों  के लाल रंग के निप्पल को सिर्फ दिखावे के लिए ढक भर रही थी , पेंटी को देख ऐसा लगता था जैसे वह सिर्फ रस्म अदायगी के लिए पहनी गई है , उससे क्या ढक रहा था या क्या दिख रहा , यह अपने आप में खोज का विषय था उसको इस अवस्था में देख उत्तेजना में मेरा सर सुन्न सा होने लगा , मेरे हाथ पाँव  ठंडे से पड़ने लगे और जिस्म की ऐठन के साथ हल्की कंपकपी सी होने लगी ...मेरी बगल में बैठा रिकार्डो उस लड़की के डांस या क्लब के बारे में क्या कह रहा था , उस वक़्त मुझे ना कुछ सुनाई दे रहा था और ना ही समझ आ रहा था ...

मेरी आँखें उस लड़की के शरीर को इस तरह से घूर रही जैसे कोई एक  भूखा शेर की मेमने के शरीर में गोश्त को देखता है ... मेरी आँखें बार बार उसके शरीर का मुआयना करने के बाद उस लड़की के चेहरे पर  आकर रुक जाती , उसकी खुबसूरत आँखें , लहराते रेशमी बाल ,लाल सुर्ख  होठ , गुलाबी गाल और सांचे में ढला बदन मुझसे हर बार यही सवाल करता , की इतनी खुबसुरत लड़की को ऐसे सरे बाजार नुमाइश करने की क्या जरूरत है ?यह अगर अपने देश में होती तो जरुर एक  टॉप मॉडल होती .....

आज से पहले इतनी खुबसुरत लड़की मैंने  कभी इतने पास से देखी तक  ना थी , मैंने  जितनी भी मॉडल टीवी के विज्ञापन या किसी मैगज़ीन  में देखी थी वह सब इसके आगे कहीं  टिकती भी  ना लगी , बिना कपड़ों  के इतने करीब से किसी को देखने की कल्पना ही मुझे उत्तजित करने के लिए काफी थी , पर इस वक़्त हकीकत मेरे सामने मुंह  खोले खड़ी थी , लड़की ने मुझे यूँ घूरते देखा तो उसने एक  कामुक अंगड़ाई ली और मेरी तरफ मुस्कुरा कर उसने दोनों हाथों से  बार को पकड़ा और उस पर  लटकते हुए अपनी दोनों टाँगे हवा में उठा दी ..उसके शरीर का लचीलापन देख मेरे मुंह  से एक सीटी  निकल गई , मेरी इस हरकत से लड़की और जोश में आ गई , वह बार को छोड़ , उसने पोल को से एक  हाथ से कस  कर पकडा और एक  जोरदार घुमावदार राउंड लिया और फिर जमीन पर  घुटनों  के बल आकर स्टेज पर आ कर  बैठ गई , स्टेज पर बैठते हुए उसने अपने दोनों उरोजों  को कस कर एक  दूसरे  से मिलाकर भींच दिया ....

उसकी इस हरक़त  ने जैसे मेरे अंदर एक  आग सी लगा दी , मुझे अपने ऊपर कंट्रोल करना मुश्किल होने लगा , अभी मैं इस झटके से संभलता की उसने अपनी चोली को एक  झटके में अपने शरीर से जुदा कर स्टेज के एक  कोने में फैंक दिया .....उसके दुशिया उरोज़  अपनी मामूली सी क़ैद  से आजाद हो कर एक मासूम  बछड़े की तरह से अपनी जगह उछल कूद करने लगे ,उसकी इस अदा पर जैसे मैं तो सकते में आ गया ...उत्तेजना से मैंने  रिकार्डो से पूछा ...यह और क्या क्या करेगी ?

रिकार्डो ने एक  गहरी मुस्कान मेरी तरफ उछल दी और बोला , यह तो अभी शुरुवात है ...आगे देखो क्या होता है ...अभी उसकी बात ख़त्म ही हुई थी की , एक  लड़की जो वेट्रेस थी हमारी टेबल पर  आर्डर लेने आगई ....हम दोनों ने नज़र  उठाकर उसे देखा तो , उसने एक गहरी मुस्कान हमारी तरफ उछाल दी और बोली बताओ कौन सी ड्रिंक आर्डर करनी है ....मैंने नज़र उठाकर उसे देखा तो ...सुन्दरता में वह भी अच्छी खासी मॉडल जैसी थी , जिसने एक  छोटी सी ब्रा और नाममात्र की पेंटी से अपने शरीर के गुप्त अंगो को दिखावे भर के लिए ढक भर रखा था ....मैंने कांपती हुई आवाज में उसे दो बियर लाने के लिए कहा और ऐसा कह अपना ध्यान स्टेज पर  लगा दिया ....

स्टेज वाली लड़की अपने शरीर को एक  रबड़ की गुडिया की तरह इधर से उधर तरोड मरोड़ रही थी , कभी वह अपनी टांगों को १८० डिग्री पर  खोलकर स्टेज पर  बैठ जाती या फिर बार से लटक उन्हें हवा में उठा देती या फिर पोल पर  चढ़कर उससे लिपटकर कभी ऊपर से नीचे  उतरती या फिर उसे एक  हाथ से पकड उसके सहारे झूल जाती ... इतनी लचक वाला बदन मैंने  सिर्फ टीवी में जिमनास्ट का या फिर किसी सर्कस में काम करने वाली लडकियों का देखा भर था , पर यह अनुभव तो मुश्किल से 3/४ फीट की दूरी पर मेरे सामने हो रहा था , उसपर उसकी कामुक अदाएं  , मेरी उत्तेजना की आग में घी डालने का काम कर रही थी ....मुझे अपनी पेंट के अंदर ऐसा लग रहा था की जैसे कोई जवालामुखी कभी भी फूट सकता है .....


अचानक लड़की अपनी एक  टांग को सीधा करके कंधे तक लाई  और फिर पोल पर एक  घुमाव लिया और सीधे होते ही अपने शरीर से नाममात्र की पेंटी को भी अलग करके स्टेज के एक  कोने में उड़ा दिया , अब वह अपनी पूर्ण रूप से प्राकृतिक अवस्था में थी और अपने शरीर को अलग अंदाज में मटका मटका कर हिला रही थी ... इस बार तो उसने हद कर दी , वह स्कवेट वाली मुद्रा में स्टेज पर  बैठी और वहीं  से उसने अपनी योनी को एक अज़ीब तरीके से हिलाना शुरू कर दिया , वह अपनी योनी को कभी टांग फैला कर खोल देती तो कभी अपनी ऊँगली से उन्हें सहला देती ...


मैं भी जोश में होश खोता हुआ स्टेज के पास चला आया और उसे जितना करीब हो सकता था उसके शरीर का ज़ायज़ा  लेने लगा ....सारे शरीर को मुआयना करने के बाद मेरी आँखे आकर उसकी योनी पर टिक गई , जैसे ही मैंने  अपनी निगाहे वहां टिकाई की उसने एक  तीखी मुस्कान के साथ मुझे देखा और अपनी दोनों टाँगे खोल दी और स्टेज पर  लगे बार से झूले की तरह से झूलने लगी , उसका शरीर हिचकोले लेता हुआ मेरे चेहरे के करीब आता और फिर दूर चला जाता , जब जब उसका शरीर मेरे करीब आता , उसकी योनी से निकलती गंध को मैं अच्छे से महसूस कर पा रहा था ...

उसकी योनी चमकदार और पूरी तरह से सफाचट थी जिसपर किसी भी बाल का दूर तक नामोनिशान तक नहीं था और न ही उसके आस पास किसी भी तरह के दाने , खरोंच या कटे फटे होने का कोई भी निशान मौजूद था ,शायद फैशन या फिर शौक के लिए सिर्फ एक  बड़ी बिंदी जितने भूरे बाल उसने योनी के उपरी सिरे के पास रख छोड़े थे , ऐसा लगता था , जैसे किसी इंसानी लैब के सांचे में ढली योनी उसके शरीर पर  अलग से लगा सी दी गई है ...

योनी में भी सुन्दरता हो सकती है यह मैंने  उस दिन जाना और समझा , अब मुझे अपने ऊपर काबू रखना मुश्किल हो गया ऐसा लगता था , ना जाने कब कोई विस्फोर मेरी पेंट के अंदर हो जायेगा , किसी शर्मिंदगी से बचने के लिए मैं बाथरूम चला गया और वहां  जाकर अपने को हल्का करने लगा .....

बाथरूम से लौटा तो रिकार्डो ने मुझे देखा और एक  गहरी मुस्कान छोड़ दी , जैसे वह समझ चूका था की बिना बियर पिए भी मुझे बाथरूम जाने की क्या जरूरत आन पड़ी , तभी वेट्रेस अपनी मदमाती चाल में आई दो बियर हमारी टेबल पर  रख दिए , इसी वक़्त उसने अपने भरी भरकम नुकीले कसमसाते उरोजों  को एक  झटका दिया और फिर एक  तीखी मुस्कान हम पर डाल कर चली गई ....

हल्का होने से अब मेरा दिमाग संतुलन में था , अब मेरी निगाहें  क्लब का जायज़ा लेने में जुट गई , क्लब में हमारे स्टेज जैसा एक  और स्टेज था , जिस पर भी एक  लड़की ऐसे ही कामुक अंदाज में अपने शरीर को पोल और समांतर बार के सहारे तोड़ मरोड़ रही थी ...वहां पर काम करने वाली वेट्रेस भी बस नाममात्र के कपडे पहने अपनी मदमाती चाल में इधर से उधर घूम कर शांत बैठे लोगों के दिलो , दिमाग और शरीर में अपनी तरफ से चिंगारी लगा रही थी ...

मुझे नहीं मालुम की जन्नत में कितनी हूर है या स्वर्ग में कितनी अप्सराएं  है , मेरे लिए यह अनुभव किसी जन्नत या स्वर्ग की कल्पना से ज्यादा मोहक और उत्तेजक  था , मैं वहां जिस भी लड़की को देखता वह या तो नाम मात्र के अंग वस्त्रो में होती या फिर बिना किसी अंग वस्त्र को पहने , अपनी प्राकृतिक अवस्था में बड़े ही सामान्य ढंग से किसी के साथ कुर्सी पर बातों  में मशगुल या फिर क्लब के बार के साथ लगे ऊँचे स्टूल पर बैठी थी ...उन्हें जैसे फर्क ही नहीं पड़ता था की उनके शरीर पर कोई कपडा है भी या नहीं ....

इस वक़्त मेरी हालत उस निरीक्षक जैसी थी , जिसे १० टॉप बच्चो में सबसे ज्यादा होशियार और काबिल बच्चे को ढूंडना था , उसके लिए सामान्य परीक्षा के बजाय किसी और तरह की विशेष परीक्षा ही उनकी काबलियत का सही मुल्यांकन कर सकती थी ....

अगर मैं आप लोगो से पूछू की नारी की योनी की सुन्दरता के क्या मापदंड है तो शायद अधिकतर आदमी बगले झाँकने लगेंगे , क्योकि योनी में भी सुन्दरता का कोई मापदंड हो सकता है ऐसी सोच शायद अभी विकसित नहीं हुई है या पुरुष इतनी दूर तक सोच नहीं पाया ?

इसके विपरीत नारी के मन में परुष के लिंग को लेकर कहीं ना कहीं एक सोच छुपी होती है , यह और बात है की अधिकतर नारी अपनी सोच को अपने मन के किसी कोने में दफ़ना देती है और वह इस सोच को अपने पति या प्रेमी से कितना भी खुला होने के बावजूद  उसे बताने में संकोच करती है .....पर यह सोच उसके उत्तेजित होने और चरम अवस्था में पहुँचने पर ही मालूम  होती है ...की नारी की लिंग के प्रति क्या सोच है , वह उसे सिर्फ एक मिलन का माध्यम समझती है या बच्चे पैदा करने भर का अस्त्र या शारीरिक सुख का माध्यम या फिर उसमे उसे एक  ऐसा विशेष आकर्षण होता है , जिसकी कल्पना वह सिर्फ अपने मन में करती है ... कभी कोई नारी लिंग की विशेष गंध को मुख मैथुन के द्वारा महसूस करना चाहती है .....

यह सब बाते ऐसी है जो अधिकतर नारी के अंतर्मन में दबी  छिपी रहती है क्योकि उन्हें बाहर  निकालने का मतलब , अपने चलते फिरते रिश्ते में एक  रुकावट बनने का अनजाना  सा डर , जो उसे यह सब कहने या सुनने से रोके रखता है ....

जहां  तक मेरा विश्वास है अधिकतर लोगो ने कामसूत्र पढ़ा होगा , नहीं तो उसे बारे में सुना जरुर होगा , अपने जवानी के दिनों में मैंने  भी पढ़ा था .... पर आज इस क्लब में आकर ऐसा लगा की जैसे वात्स्यायन  को पुनर्जन्म लेने की आवश्यकता है , शायद वह अपने कामसूत्र का नया संस्करण लिख ले ...शायद जब वात्स्यायन ने कामसूत्र लिखा था , तब उसने नारी के शरीर को इस तरह खुली अवस्था में इतने अच्छे ढंग से देखा और परखा नहीं होगा ....

अब मेरी उत्सुकता स्टेज पर आने वाली हर लड़की की योनी को देखने और परखने में थी , हर 10  से 15  मिनट में नयी लड़की स्टेज पर  आकर अपनी अदाओं  , शरीर और डांस का नज़ारा  पेश करती , जो जितनी कामुक , हसीन और मस्त होती उसे उतनी ही ज्यादा , वहां आये हुए अधेड़ उम्र के मनचलों द्वारा टिप मिलती ....क्लब का नियम था , आप स्टेज के पास जाकर खड़े हो सकते है , लड़की की मर्जी है की वह आपको छुए या अपना शरीर आपके गाल या हाथ से छुआ  दे , पर आप उसे अपनी तरफ से टच नहीं कर सकते और ना ही स्टेज पर चढ़ सकते है , अगर कोई ऐसा करता तो क्लब के बाउंसर उसे बाहर  फैंक देते .जो लड़की जितनी ज्यादा कामुक , अच्छी फिगर वाली और मस्त होती उसके स्टेज के आगे मनचले अधेड़ कुछ  डॉलर्स  के नोट लेकर खड़े हो जाते , वह उन्हें कभी अपने उभारों  को ,तो कभी अपने नितंबों को हिलाकर दिखा देती , तो कभी अपने गाल या उरोजों  को उनके चेहरे पर रगड़  देती , और बदले में वह कुछ (2/4 $) नोट लड़की की जांघ पर  बंधी एक  रबर बैंड में खोंस देते ... अगर किसी मनचले की टिप कुछ जरा ज्यादा (10 या 20 $)मोटी होती तो , वह उनके आगे घुटनों के बल बैठ अपनी योनी को खोल कर उसके दर्शन करवा देती या , एक  लड़की ने एक  मनचले के गले में अपने टांगो की कैंची बन कर अपनी योनी उसके मुंह  से रगड़  तक दी ....


आज से पहले मैंने  नारी की सुन्दरता को उसका चेहरे में , गुलाबी गाल , सुर्ख होठ , कज़रारी आँखे में देखी  या फिर नारी के शरीर में उसके उभरे नुकीले उरोज़  , कड़क  भारी नितम्ब , चिकनी लंबी टाँगे और लहराते काले बाल सोचे भर थे , पर योनी से भी नारी के शरीर की सुन्दरता देखी और समझी जा सकती है इसका अनुभव आज हो गया था ....ना जाने क्यों मेरे मन में वहां घूमती हर सुंदर लड़की की योनी को ध्यान से देखने का भूत सवार हो गया ....क्योंकि बांकी हर चीज में तो सब जैसे एक  समान खुबसूरत थी ....

कुछ डॉलर्स  में कोई जवान हसीन लड़की ऐसी हरकत भी कर सकती है यह मेरी सोच और समझ के बाहर था , दो चार लडकियों की परफॉरमेंस देखने के बाद , मूझे उनके शरीर में अब कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी , सारी लडकियों के बदन सांचे में ढले , उरोज़  कसे और अच्छे से तने हुए और चेहरे कामुक आदाओं  से भरपूर थे , उस वक़्त उनमे से किसी एक  को भी पाना ही जीवन में सुन्दरता का अनुपम उपभोग हो जाता ...अब मुझे उनकी शारीरिक सुन्दरता से किसी भी तरह का तनाव महसूस नहीं हो रहा था ....

इस वक़्त मेरी हालत शादी में आये उस भूखे आदमी की तरह थी जिसकी भूख शांत हो चुकी थी अब वह सिर्फ मन बहलाने के लिए मंडप में सजी मिठाइयों को सिर्फ देख रहा था ...

अब मुझे किसी के चेहरे या चाल , ढाल या फिर उरोजों  में कोई दिलचस्पी नहीं थी ,सब अपने आप में किसी ना किसी तरह से बेमिसाल थी , अब मैंने  स्टेज पर आने वाली हर लड़की की योनी को देखना और परखना शुरू कर दिया , इसी सिलसिले में , भविष्य में ,मैं जितनी बार भी जेंटलमैन क्लब गया , मेरा उद्देश्य नारी की योनी को देखना , समझना और परखना होता जितना मैंने  देखा और समझा और इसी जिज्ञासा ने मुझे योनी की एक नई व्याख्या सिखाई ...

वात्स्यान ने कामसूत्र में योनी को नारी के शारीरिक आकर के हिसाब से ४ तरह से लिखा , जैसे शशक (खरोगश ), हिरणी , घोड़ी(अश्वनी) और हथनी ...शायद उस वक़्त वात्स्यान के दिमाग में सिर्फ योनी का आकर ही एक  महत्वपूर्ण कारक था , इसलिए उसने योनी के आकर के हिसाब से नारी की व्याख्या कर दी ...की सबसे छोटे कद की खरोगश और सबसे बड़े कद की हथनी ...और तो और उनके सफल और आनंदायक सम्भोग के लिए उन जैसे साथी का चयन भी बता दिया ...

पर मेरे अनुभव ने नारी की योनी को  सबसे अलग एक  नयी तरीके की व्याख्या  दी और योनी की सुन्दरता का एक  पैमाना बनाया ...मेरे अनुभव ने यह समझाया की किसी भी नारी या पुरुष के शरीर के अनुपात में उसका गुप्तांग हो ऐसा जरुरी नहीं है , इसलिए किसी भारी भरकम नारी जो वात्स्यान के हिसाब से हथनी वाली श्रेणी में आती है की योनी का आकर भी बड़ा होगा और उसे सम्भोग में अपने जैसे हाथी टाइप बड़े आदमी से पूर्ण संतुष्टि मिलेगी , यह भी एक  मिथ है ...

मैंने उस दिन और बाद में भी जेंटलमैन क्लब में नारी की कई तरह की योनियाँ देखि , कई बार तो अच्छे लम्बे कद की लड़की की योनी बहुत छोटी और सिकुड़ी सी होती , इसके विपरीत एक  छोटे कद की लड़की की योनी बड़े आकर में फैली सी होती और दोनों के योनी मार्ग भी उनकी योनियों के आकर अनुपात के हिसाब से ना होकर कभी बहुत ज्यादा खुले या तंग होते ...

मैंने  नारी की योनी को एक  ऐसी श्रेणी में रखा जिसमे योनी की तुलना हम किसी संकरी सी गली के आगे लगे दरवाजे से कर सकते है ...इसे ऐसा समझे जैसे किसी घर के आगे एक  दरवाजा है जिसमे दो पल्ले(कपाट) लगे है यानी दो किवाड़ वाला दरवाजा है ....अब यह उस दरवाजे की हालत पर  निर्भर करता है की.......

1.दोनों कपाट इस तरह से भिड़े है की वह दोनों जुड़ कर लगभग बंद जैसे लगते है और उन दोनों कपाट के जुड़ने से दोनों के बीच में हलकी सी एक  झिरी सी दिखती हो या
२. दोनों कपाट अंदर की तरफ थोड़े से खुले है, जैसे किसी ने दोनों दरवाजो को घर के अंदर धकेल का हल्का सा खोल कर छोड़ दिया है या
3. दोनों कपाट बाहर  की तरफ ऐसे खुले है जैसे किसी ने हड़बड़ी में दरवाजे बाहर  की तरफ खोल कर छोड़ दिए है या
४. एक कपाट के ऊपर दूसरा कपाट ऐसे सा चढ़ा , जैसे दरवाजा बंद करते वक़्त किसी ने अनाड़ीपन में एक  कपाट पर  दूसरा कपाट लगा कर छोड़ भर दिया है...

मेरे अनुभव ने नारी की योनी को उनकी सुन्दरता , आकर और शारीरिक आकर के हिसाब से देखा और परखा , क्योकि नारी की योनी किसी विशेष समुदाय , देश ,रंग और जीन्स के हिसाब से अपना आकर लेती है और योनी की सुन्दरता और विशेषता या ऐसी नारी के प्रति पुरुषो में इच्छा भी उसके देश में उसी हिसाब से मापी भी जाती है ...

इन चारो श्रेणी की नारी में योनी का आकार बड़ा या छोटा कुछ भी हो सकता है और किसी व्यक्ति विशेस का अपनी योनी को स्वच्छ और साफ़ सुथरा रखना भी , योनी की सुन्दरता में चार चाँद लगा देता है ...एशियाई देश की अधिकतर नारी अपनी योनी के आसपास छोटे बाल रखती है और जापान में ऐसी योनी को बहुत आकर्षक भी माना जाता है ...इसके विपरीत योरोप के देश में अधिकतर नारी क्लीन शेव योनी रखती है या योनी के पास बाल की एक  पतली लाइन सी और ऐसी योनी पुरुषो के आकर्षण का केद्र बिंदु भी होती है .....किसी पुरुष को नारी की सुनहरी या सांवली योनी में तो किसी को हलकी गुलाबी योनी में आकर्षण लगता है .

मैंने  जितनी भी तरह की योनी को देखा और परखा , तो लगा योनी की तुलना होठों  से की जा सकती है मुझे वह योनी सबसे ज्यादा आकर्षक लगी जिसमें  दोनों कपाट जुड़ कर बंद से प्रतीत होते है , क्योंकि यह ऐसी प्रतीत होती है जिसे किसी खुबसूरत लड़की के पतले होठ एक  लिपस्टिक से सज कर जुड़े से हो , पर होठ अगर ज्यादा मोटे हो यां लटके हो तो उनमें  एक तरह की बदसूरती सी आ जाती  है , हो सकता है किसी को उस तह के होठ पसंद हो , क्योंकि अभी  कुछ दिन पहले फ़िल्मी हेरोइनो में मोटे होंठों  का फैशन बड़े ज़ोरों  पर था ...

मेरे अनुभव से किसी योनी के मार्ग में आगे की तरफ लटकी छोटी सी खाल जिसे मेडिकल टर्म में लाबिया मिनोर्मा (लघु कोष्ठ) बोलते है का ज्यादा फैला होना योनी की सुन्दरता को कम कर देता है ...उसका बहुत कम होना भी योनी की सुन्दरता को कम करता है ...अगर यह हद  से ज्यादा हो तो सम्भोग में नारी को अनचाही दिक्कत का सामना भी करना पड़ता है , पर इसके विपरीत अगर यह थोडा आकर में छोटा हो तो , पार्टनर द्वारा मुख मैथुन में नारी को अतिरिक्त संतुष्टि और आनन्द देना वाला भी हो जाता है .... इसके विपरीत इसका ना होने से योनी में एक तरह  का अपना आकर्षण होता है .

कितनी सारी योनियों में कहीं  किसी का द्वार बहुत बड़ा तो कहीं  सिकुड़ा सा होता , कहीं  लाबिया कुरूपता की हद तक लटकी होती तो कहीं  वह नाममात्र की जगह लेकर योनी को एक  सुरक्षा कवच  सा प्रदान करती , किसी किसी नारी की योनी के आसपास , लगी खरोचें  या हलके दानें उनके प्रति एक अज़ीब  सी उबकाई पैदा करते , तो किसी की योनी की चमक , उसके प्रति एक अज़ीब सी कशिश भी पैदा करते हैं .....

कहने का तात्पर्य यह है की , किसी नारी का चेहरा खुबसूरत, सांचे में ढला बदन और कामुक अदाएं  हो और उसकी योनी भी सुंदर और आकर्षित हो ऐसा बहुत ही कम देखने को मिलता , कई बार नारी की लापरवाही उनकी योनी में अनजानी बदसूरती भी उड़ेल देती ....जबकि वह नारी हर लिहाज़  से अनुपम सुन्दरी होती है ...

इसी खोज   में मैंने  कई तरह की योनियों का अध्यन किया और आज भी जब किसी खुबसूरत नारी को देखता हूँ तो मेरा मन खुद से यह सवाल करता है की , इसकी सुन्दरता किस पैमाने से नापूं , इसे शारीरक रूप से देखूं  या इसकी अदाएं  कितनी मतवाली है या इसकी आँखे कितनी गहरी या इसकी चाल कितनी मस्त है या इसके होठ कितने रसीले या इसके बाल कैसे लहराते है या इसके गाल कैसा मीठा अहसास जगाते है या इसके उरोज़  कितने कामुक है या इसकी टांगे कितनी चिकनी होंगी यह कपड़ो में ज्यादा खुबसूरत होगी है या बिना कपड़ो के या इसका दिल कितना खुबसूरत है वह समझू ....

अगर यह बिना कपड़ों  के होगी तो क्या इसका शरीर सांचे में ढला जैसा होगा या फिर इसके उभार कसमसाते से होंगे या फिर इसकी योनी की खूबसूरती मुझे मतवाली बना सकेगी .....

बस यह कभी न ख़त्म होने वाली मेरी प्यास एक  आजन्म की खोज़  बनकर मुझे दर बदर भटका रही है .....

By
Kapil Kumar 

समाप्त :

Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely coincidental.' ”

Wednesday, 18 January 2017

I wish.....


I wish that
 I could be a kite,
 Flying without fear of falling
 In the open sky,
I want to climb very high 
Leave the ground for a while.

Moving towards the sun
And to chase the clouds,
To fill the wind in 
My body and mind.
I will go up and down
To catch the thrill 
Which was missed
Just laying on the ground.

I may get very easy to loose
There is no worry
A strong string attached to my hook.
Someone is holding me tight and mild,
Give the right boost
 To keep me flying.
If  I go too much down 
Someone pulls me tight 
I get back around.

My thirst wants
 To take me too much far,
Thankful to the attached string to
Bring me at par. 
I am too light and fancy 
People amaze how I could fly so rashly.
I can fly fearlessly  till I am strong 
Once this relation is broken 
I may end up at no one's land.

I am delicate and fragile
Still hardly hurt 
Even hit  hard from a high,
Never lose my courage to go up again 
Hardened push teaches me a lesson 
You can always begin again

By
Kapil Kumar

Thursday, 5 January 2017

प्रेम की वज़ह


यह तेरे ही तो दिल का दर्द है , 

जो मेरे सीने में उठता है फिर इस दर्द को हम पिए , 
दोनों की ऐसी कौन सी सजा है ?
यह तेरा ही तो आँशु है , 
जो मेरी आँखों से बहते है फिर इस सजा को इस तरह काटे , 
ऐसा कौन सा गुनाह हमने किया है ?
यह तेरी ही रूह का तो आकर्षण है , 
जो मुझे तेरी तरफ खींचता है 
फिर मुझसे तू इस तरह से दूर जाए , 
ऐसी कौन सी मेरी ख़ता है ?
यह तेरा ही तो बनाया बंधन है ,
 जिससे मैं बंधा हूँ फिर मुझसे यूँ रुसवा होने की , 
यह किसके लिए तेरी वफ़ा है ?
यह तेरा ही तो मोह है , 
जिसके खातिर मैं तेरे पीछे पड़ा हूँ फिर मुझसे रूठ जाने की , 
यह कौन सी तेरी अदा है ?
यह तेरा ही तो जीवन है , 
जिसके सहारे चलती मेरी साँस है फिर इस बात को भूल जाने की , 
ऐसी कौन सी वजह है ?
यह तेरा ही तो शरीर है , 
जिससे मेरा भी दिल जुड़ा है फिर इस तरह से मुझे अलग करने की , 
यह किसके प्रेम की  वज़ह  है ?

By 

Kapil Kumar 

Wednesday, 4 January 2017

हर रूप में बार बार ....


किसी को मोहब्बत होती है जिस्म से , तो
किसी को होती है अपनी जान से 

कोई मर मिटता है किसी के हुस्न पर , तो कोई
होता है फ़िदा अदा पर 

मैं अपनी मोहब्बत और चाहत की क्या तारीफ़
करूँ 

जो शुरू और खत्म होती है बस तेरे नाम से ....

तू
करती है शिकवे शिकायत मेरी मोहब्बत के बार बार 

उसे तोल कर देखती है रूह के रिश्तों में हर
बार 

कभी मेरी रूह से मेरे जिस्म का हाल भी पूछ
लेना 

जिसने बस तुझे चाहे हर रूप में बार बार ....

By
Kapil Kumar 

नववर्ष


मिले तुझे नववर्ष में यह उपहार , रहे तेरी जिन्दगी गुलज़ार  

यूँ तो तुझे चाहत नहीं है , इस चमकती दमकती
चीज़ों  की 

पर चमके तेरा चेहरा खुशियों से बार बार 

जैसे बीता वर्ष छूट गया पीछे , तू भी छोड़
दे अपनी जिद के सलीके 

आ नए साल में एक  ऐसा जश्न मनाये , हम कौन
है क्या है इसे बस भूल जाए .....


By 
Kapil Kumar 

Thursday, 29 December 2016

तेरे आने का अंदेशा ....



किस किस बात के
शिकवे कितनी बार करूँ 

किस किस दर्द की
शिकायत किस किस के पास करूँ 

हैं मेरे सीने
में जख़्म ही कुछ ज्यादा 

किस किस की
मैं अब दवा करूँ ....

अब तो कुछ आदत
सी हो गई है 

इन ज़ख्मों  को
सीने में संजो कर रखने की 

है यह मुश्किल
अब मेरी ,किस को अपने पास रखूं 

और किस किस को
अपने से दूर करूँ ....


जब भी गिरता
है कोई अश्क तेरा 

मेरा दिल खून
के हजार आंसू  रोता है 

तू मेरी
मोहब्बत नहीं इबादत है 

तेरे सजदे के
बिना मेरा कब सवेरा होता है .....


कैसे काटू
मैं यह दिन जुदाई के 

बड़ी मुश्किल
से यह दिल बहल कर सोता है 

जिस्म को दे
दूँ झूठी तस्सली तेरे आने की 

पर अफ़सोस ,
रूह को नहीं अब होता भरोसा है ...
मेरी आशिकी को
जिस्म की चाह मत समझना 

मेरी मोहब्बत
को दीवानगी का आलम मत कहना 

यह फितूर नहीं
है अब मेरे बस का 

क्यों हर आहट

पर  तेरे आने का अंदेशा होता है ....

By
Kapil Kumar 

Sunday, 18 December 2016

आधुनिक भारत का तुगलक - भाग 2




भारत सरकार  ने एक  दिन रात के 8 बजे घोषणा करके देश में चलने वाले 500 और 1,000 के नोट को अमान्य घोषित कर दिया ... अब यह फैसला कितने दिल और दिमाग से लिया गया है इसके परिणाम आने लगे है ...शर्म और दुःख की बात यह है की तुगलकी फरमान एक  के बाद एक ज़ारी है ...वर्तमान सरकार और नौकरशाही अपनी गलतियों से सबक ना लेकर एक के बाद एक  उल्ल ज़लूल   फैसला ले रही है , जिसमे ना तो कोई समझदारी है ना ही दूरदर्शिता ...

अगर आपने कोई फैसला लिया और उसके लागू करने में कोई चूक हुई तो उसे क़बूल  कीजिये ना की एक  गलती को छुपाने के लिए दूसरी फिर तीसरी गलती करके जनता को ग़ुमराह  मत कीजिये ...पर यह बात किसको और कैसे समझाई जाए जब ...समां ऐसा बना हो ...

“बर्बादे  गुलिस्तां करने को एक  ही उल्लू काफी था , अंजामे गुलिस्तां क्या होगा जब हर शाख पर  उल्लू  बैठा है “

नोटबंदी करने की हड़बड़ी में सरकार ने जो जनता की मुसीबत नाम का जिन्न भ्रष्टाचार  की बोतल से बाहर  निकाल दिया  है उसे अब वह किस तरह से अंदर घुसाए , ना तो उसे कुछ समझ आ रहा है ना ही उसे कुछ सुझाई दे रहा है ..असली समस्या यह है की झूठी शान और जिद्द  में घिरा व्यक्ति सिर्फ अपना ही घर बर्बाद नहीं करता वह अपने साथ आने रिश्तेदारों , अडोस -पड़ोस  सब को ले डूबता है ....

आधुनिक तुगलक की मंशा कितनी अच्छी थी या धूर्त यह तो आने वाला वक़्त बताएगा ...पर अभी के लिए हम मान ले की तुगलक ने जो किया देश और जनता की भलाई के लिए किया  ..पर उसका परिणाम क्या निकला उसके लिए एक  सवाल है , जिसे अपने दिल पर हाथ रख कर दे ....

आपने किसी  समझदार दोस्त के साथ बिजनेस किया और दोनों ने मिलाकर 5 लाख का प्रॉफिट कमाया , अब जब प्रॉफिट  बाँटने की बारी आई तो आपके दोस्त ने बईमानी करके 4 लाख खुद हडप लिए और 1 लाख आपको दिया ..आप उसे जीवन  भर  गाली दे रहे है ..की उस धोखेबाज़   ने धोखा दिया और घोटाला किया ....

अब आपने एक  मूर्ख  दोस्त के साथ बिजनेस किया जिसने आपको 2 लाख का घाटा दिया , जिसमे उसने थोड़ी सी बईमानी की और आपको 1.25 लाख का घटा दिया और खुद 75 हजार का घाटा लिया ..अब आप उसकी तारीफ़ करे और कहे की ..भाई यह कितना ईमानदार है ..इसने सिर्फ 25 हजार की बईमानी की ....

तो दोनों घटना आज के परिवेश के लिए है ...की पिछली  सरकार , पहला वाला दोस्त है और वर्तमान  सरकार दूसरा वाला दोस्त है , अब यह आपकी व्यापारिक सोच है की आप किसे इमानदार समझे और किसे बईमान....और किसके साथ व्यापार करने में समझदारी है ...

अच्छी खासी चलती और बढती हुई अर्थवयवस्था को गर्त में डालकर सरकार क्या हासिल करेगी यह तो शेखचिल्ली के सपने जैसा है ...जनता भी कितनी भोली है की अच्छे दिन आयेंगें  ..अरे जरा पुराने दिन को याद करो वह अच्छे थे या यह दिन ...पर कौन किसे और क्या समझाए , जब इन्सान अपनी ही बलि देने पर उतारू हो की उसे जन्नत का टिकेट मिलेगा , फिर ऐसे भक्त के लिए विलाप भी क्या और कैसे किया जाए ?

बात ब्लैक  मनी , आतंकवाद की हुई थी और आज दोनों ही अपने पूरे ज़ोर ख़रोश   में है ...पहले बैंक के बाबू इमानदारी से काम करते थे , सिर्फ इक्का दुक्का बैंक मेनेजर ही किसी तरह के घपले में लिप्त होता , अब आपने बैंक के बाबु , कैशियर को  भी सिखा दिया की बैंक में भी उपरी कमाई कैसे होती है ....धन्य हो प्रभु ..

आतंकवाद की घटना पिछले एक  महीने में किस रफ़्तार से बढ़ी है , यह भी देखने और समझने की बात है , उस पर तुर्रा यह है की सरकार  अपनी बेवकूफ़ी का प्रदर्शन घर में ही नहीं विदेश में भी जमकर कर रही है ...आपकी सेना ही सुरक्षित नहीं बाकी देश और जनता की सुरक्षा आप किस बूते करंगे , उसपर आपकी छाती है की सुकड़ती  तक नहीं ..बेशर्मी की हद यह है की गलती से सबक लेने के बजाय  दूसरो पर इल्ज़ाम डालना  ...यह सब पिछली  सरकार के 70 साल की गंदगी है ...

बहुत अच्छा भाई ...फिर पिछली सरकार के 70 साल का ही डिजिटल नेटवर्क है , रेल लाइन्स  है , बैंकिंग सिस्टम है , दूर संचार , मेट्रो सिस्टम , स्कूल , सड़क  , हॉस्पिटल , सरकारी वयवस्था , क़ानून , सेना , उसकी तोप , बन्दुक  , जहाज़   सब कुछ पिछली 70 साल की सरकार  का है ....फिर आप उसका इस्तमाल कैसे कर रहे है ...भाई बहुत खूब जो 70 साल में हुआ वह सब मुफ्त में और जो कुछ गलत हुआ वह उनकी गलती ....जब देश आजाद हुआ था , तब इस देश के पास क्या था और आज क्या है ?


इंडिया की इकॉनमी  1947 किस  दर्जे पर  थी और अब यह क्या ,कितनी बड़ी सेना थी आपकी 1947 में और उसके पास क्या था ? कितने घरों  में कार , टेलेफोन , टीवी था ?  जिस देश में एक  सुई तक ना बनती थी आज वह लड्कू विमान निर्यात करता है ...यह सब आपने दो साल में कर लिया ?  सरकार  और भक्तों की अक्ल और झूठ की कोई सीमा नहीं ...

बात करते है की हम फ़कीर है ....झोला लेकर निकले है ..भाई आप किसी टाटा बिरला की औलाद तो कल भी ना थे , आपके पास क्या था , आपने कौन सी डिग्री ऐसी ली थी की किसी कम्पनी में आप कोई डायरेक्टर होते  , या अपने कोई बिजनेस चला रखा था , फिर एक  फ़कीर के पास कुछ था खोने के लिए ? उसके पास जितनी अक्ल थी उसने लगा दी ....

आज की तारीख में डिजिटल इंडिया का सपना ऐसे ही है जैसे बिना पटरी के रेल दोडाना , पर क्या कर सकते है तुगलक की सरकार  है , ऊँचे और अच्छे विचार है , पर किसी प्रक्रिया  को लागू करने की अक्ल की कमी सब को ले डूबेगी ....

आप डिजिटल इकॉनमी की बात करते है ...किसके लिए ..90  करोड़  जनता यानी 70 % के पास  शाम तक होते होते एक  धेला  बचता नहीं , 1.5 % लोग  यानी 3 करोड़  लोग अपने पास एक  धेला रखते नहीं , क्योकि उन्हें अपने हाथ से खर्च करने की आदत नहीं है , उनके बिल तो उनके चमचे , असिस्टेंट या नौकर  या तो उनकी कंपनी के नाम या फिर सरकारी खाते से जाते है ..बची 15 से 20 % जनता जो मिडिल क्लास है ..सारा स्यापा उसे लेकर है ...भाई उनके लिए आपका आर्थिक ढांचा है , जो इतने बड़े बोझ को संभाल ले ...

क्रेडिट कार्ड कौन और किसे देगा , उसका कमीशन  किसे मिलेगा सिर्फ मल्टी  नेशनल को , उसकी क्रेडिट हिस्ट्री कौन और कैसे मैनेज होगी , साइबर क्राइम के केस में उपभोक्ता के हक़ के लिए क्या होगा ? है आपके पास इन सबके जवाब ?

उपभोक्ता क्यों क्रेडिट कार्ड से पेमेंट देकर 2.5 से 3% एक्स्ट्रा अपने ऊपर लोड ले , सेल टेक्स वसूलना सरकार की जिम्मेदारी है , उसमे उपभोक्ता क्यों सरकार के लिए अपनी कुर्बानी  दे , वैसे ही देश में पहले ही वेट , स्वच्छ भारत , सर्विस टैक्स के नाम पर  उसकी जेब काट ली जाती है ,एक  नया बोझ उसके जिम्मे और डाल दे ...यही वह इमानदार मिडिल क्लास है जो सबसे ज्यादा इनकम टैक्स देता है , अब उसकी बलि लेनी बाकी थी वह भी आपने अच्छी तरह से ले ली ....

एक  कुत्ता दुसरे कुत्ते का मांस  नहीं खाता यह सुना था पर देख लिया , जब सारे राजनितिक पार्टियाँ अपने चंदे के धन को सफ़ेद करने के लिए आज़ाद  छोड़ दी गई ...भाई शिकार तो सबको आम जनता रूपी मेमने का ही करना है ....

दूसरे  क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड की पेमेंट में बुजुर्ग , कम पढ़े लिखे लोगो के साथ जो हेरा फेरी होगी उसका जिम्मेदार कौन होगा ?  क्या सरकार  इन सबकी जिम्मेदारी लेगी और उनकी सहूलियत और सुरक्षा के लिए उपाय करेगी ?.. हालत देखते हुए तो यह शेखचिल्ली के सपने से कम नहीं है ....आप  से रिज़र्व बैंक से नोटों की सप्लाई तो कंट्रोल होती नहीं ....किस बैंक में कितना पैसा पहुंचा और किसको कितना मिला इसका हिसाब तो आपको पता नहीं ....आप चले है आम जनता के हिसाब का ठेका रखने ....

उसपर सरकार न होकर एक  चिट फण्ड कम्पनी लगती है जो अपनी लुभावनी स्कीम से लोगों  को लुभा रही है , यह पहली सरकार है जो अपने ज़रूरी  काम धाम छोड़ कर आये दिन , नए नए बम्पर इनामों की घोषणा कर रही है ..अरे आप स्विस अकाउंट वालो को पकड़ो , जिन्होंने लोन नहीं दिया उसकी उगाही करो , दुकानदार सेल टैक्स क्यों नहीं देता , उसका कारण जानो और सख्ती करो , नोटों का वितरण ठीक से क्यों नहीं उसका हल खोजो ...नहीं ....

सरकार और मशीनरी  सड़क पर  मदारी का खेल दिखने वाला जमूरा बन गई है ...जो बड़ी शान से अपनी नयी नयी गुलाटियों यानी स्कीमों को ऐसे दिखा रही है जैसे कितने बड़े काम की हों ...

अभी तक एक  बेसिक सा एप्लीकेशन तो इंडिया में है नहीं जो बाहर  के मुल्कों में बहुत ही कॉमन है , की आप घर बैठे अपने सेल फोन से अपना चेक जमा कर ले ....साइबर सुरक्षा के नाम पर चीन के बने सेल फोन आम जनता के बीच’ भरे पड़े है जिनमे कितने सारे वायरस है , हार्डवेयर सुरक्षा जैसी चीज से सेल फोन वास्ता नहीं रखते ...इसका कुछ  पता भी है इस  तुगलकी सरकार के आला अफसरों को ....ऐसे में डिजिटल करेंसी के पीछे अंधी दौड़ कितनी वाज़िब  है ?


अगर चीन का  हैकिंग सिस्टम अपनी नीचता पर  आगया तो आपके डिजिटल करंसी और इकोनोमी की जो वॉट  लगेगी , उसका जरा भी इल्म  है इस तुगलकी सरकार को ....यह कौन सी अल्क्ल्मंदी है की आप बिना ब्रेक की गाडी हाई वे पर  लेकर निकल जाए ..अगर एक्सीडेंट हुआ तो बोल दे 70  साल की गन्दी थी ...

डिजिटल इंडिया का सपना ऐसे ही जैसे तुगलक का दौलताबाद को दिल्ली बनाने का सपना था , दौलताबाद को राजधानी बनाना  इतना गलत नहीं था , जितना तुगलक की जिद्द की सारे दिल्ली बाले दिल्ली छोड़ दौलताबाद जाए और दौलताबाद , दिल्ली जैसा हो जाये ..ऐसे ही सारे भारत को डिजिटल इकॉनमी  बनाने का सपना भी तुगलकी सपना है ...

अगर यह सिर्फ शहरों के लिए होता तो भी समझ आता , एक  बेचारे दूर  दराज के गाँव में जहां लोग , बिजली और पानी जैसी मूल भूत सुविधाओं  से महरूम है आप उन्हें प्लास्टिक  के कार्ड पकड़ाएंगें  ..बहुत खूब ..

गर्मियों में दिल्ली जैसे शहर में बिजली की क्या सिथिति है उस वक़्त आपके डिजिटल नेटवर्क का क्या होगा , उसका प्लान भी बना लेते , बारिश में आम टेलेफोन लाइन में क्या होता है उसका भी कुछ सोच लेते , तब क्रेडिट कार्ड मशीन कैसे परिणाम देगी ,इतनी सारी इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन  इतने कम समय में , कौन सा नेटवर्क इतना बोझ ले पायेगा इसका भी कुछ ख़्याल  कर लेते ...अब यह सब कौन सोचे ....बिजली , पानी , सड़क  , पुलिस  ,स्कूल , हॉस्पिटल बने या न बने ...बस क्रेडिट कार्ड जरुर बने ....

सरकारी जिद्द ऐसे है बस हमें तो अपनी डिजिटल इकॉनमी  की ट्रेन दौड़ानी है  ....पटरी हम बाद में डाल लेंगें  ...

By 
Kapil Kumar 

Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely coincidental.' ”

आधुनिक भारत का तुगलक - भाग 1


भारत सरकार ने एक  दिन रात के 8  बजे घोषणा करके देश में चलने वाले 500 और 1,000 के नोट को अमान्य घोषित कर दिया ... अब यह फैसला कितने दिल और दिमाग से लिया गया है इसका फैसला वक़्त ही बताएगा , पर इस फैसले ने देश में जो हालात पैदा किये है , उसकी सही तस्वीर देखने और समझने के लिए हमें अपने आप से पूछना पड़ेगा की जो हुआ और जैसे हुआ क्या उससे बेहतर हो सकता था ? खैर  नोटबंदी की इस घटना को मैंने  अपने नज़रिये  से देखा और परखा ...इसी दौरान हुए अनुभव ने मुझे भारत के इतिहास और साहित्य की कुछ घटनाओं और कथाओं को मेरे ज़ेहन  में फिर से जिन्दा कर दिया ... हम इस नोटबंदी को भारत के इतिहास में हुई कुछ ऐसी घटना से तुलना करके देखते है , साथ ही इस से उपजी सामाजिक व्यवस्था  और लोगों की सोच और उनकी प्रतिक्रिया  को कथा के माध्यम से परखते और समझते है ...

कहने को भारत सरकार अपने फैसले को कालाधन , नकली नोट  भ्रष्टाचार और देश की सुरक्षा के लिए लिया गया फैसला बताती है , हो सकता है भारत सरकार ने इसी सोच को ध्यान में रख यह कड़ा  फैसला लिया हो , पर यह फैसला भारत के इतिहास में दर्ज मोहम्मद बिन तुगलक की याद दिलाने के लिए काफी है , जिसने अपनी गहन सोच और राजनितिक सूझ बुझ के चलते , देश में चमड़े के सिक्के चलाये और फिर उसका परिणाम क्या हुआ , यह इतिहास में दर्ज़  है , इतना ही नहीं उसने अपनी राजनितिक चतुराई का भरपूर इस्तमाल करते हुए , भारत की राजधानी दिल्ली को दौलताबाद शिफ्ट किया और उसके बाद जो देश में अफ़रातफ़री का माहौल  बना उसका परिणाम भी इतिहास में दर्ज़ है ..मोहम्मद तुगलक ने अपने फैसलों को उस वक़्त देश और जनहित में लिया गया एक कड़ा  कदम बताया , पर इतिहास बताता है की उसका फैसला कितनी समझ बूझ और परिपक्वता  से पूर्ण था ....आज भारत अपने उसी इतिहास को फिर से दोहराता लगता है ...एक  चलती फिरती , उभरती अर्थवयवस्था में ..इसी सोच और समझ बुझ से कितना बड़ा ब्रेक लगा है और उसके क्या दूरगामी परिणाम होंगे यह भारत के इतिहास में अवश्य लिखा जाएगा ...

सिर्फ अपनी जिद्द  , झूठी शोहरत  और चाटुकारों से घिरे  भारत के बादशाह ने आज फिर तुगलक को अपना अघोषित गुरु बना लिया है ....

मोहम्मद बिन तुगलक ने जो किया और उसके बाद इस देश की जनता ने जो कड़वे  घुट पिए ...वह एक  अलग तस्वीर है ...पर यही जनता कितनी मासूम है इसे हम एक  और नज़रिये  से देखे और समझेंगें  ...आजकल मीडिया में लोगो का इंटरव्यू बड़ी शिद्दत से दिखाया जाता है , की लोग बैंक के आगे खड़े होकर अपने ही पैसे के लिए भीख मांगते हुए भी बड़ी शान और फक्र से कहते है , बहुत ही अच्छा फैसला है , जबकि सच्चाई यह है , यह वही लोग है , जो कभी राशन की लाइन में खड़े होने पर  स्यापा करते थे और काला बाज़ारियों को दिन रात कोसते थे ,पर मौका लगते ही राशन का सामान बाजार में बेच देते थे , यह वही लोग है जो ड्राइविंग लाइसेंस बनाने के लिए अंडर टेबल से काम चलाते है और इनमें से कितनो ने सही में ड्राइविंग टेस्ट दिया है , यह वही लोग है जो , जरा सी ट्रैफिक लाइट पर  खड़े होने पर गुस्से से लाल पीले हो जाते है और मौका देख लाल बत्ती धड़ल्ले से पार कर जाते है ....यह वही लोग है जो सडक दुर्घटना में तडपते हुए लोगों को सिर्फ इसलिए नहीं उठाते की कहीं  इनका महत्वपूर्ण समय बर्बाद ना हो जाए , यह वही लोग है जिनके सामने किसी की इज्जत लूटी जाती है और अपनी आंख फेर कर निकल जाते है , यह वही लोग है जो लाइन में खड़े होने जैसे संस्कारों से अछूते है ....पर आज बैंक के आगे खड़े होकर छाती ठोंक कर फक्र महसूस करते है ..

इस सन्दर्भ में इक कहानी याद आती है ...एक  मुर्ख किस्म का राजा था , जो अपनी जिद्द  , अजीबों गरीब शौक और अपने ऊल ज़लूल  फैसलों के लिए प्रसिद्ध था , एक  बार एक  शातिर और धूर्त किस्म का आदमी उसके दरबार में आया , उसके मन में राजा को लेकर एक  दबा हुआ विद्रोह था , उसने राजा को बेवकूफ बनाने और ठगने के लिए एक  स्वांग रचा ..वह राजा के दरबार में गया उसकी झूठी प्रसंशा में उसने बड़े बड़े कसीदे गढ़े , राजा अपनी शान , यश और चतुराई की झूठी प्रसंशा से फुला  ना समाया , जब राजा उस व्यक्ति के वाक्य जाल में उलझ गया तो उसने , एक  जालीनुमा चादर राजा को भेंट किया और बोला महाराज ,यह एक दैविक  चादर है , इस चादर की खूबी है , जो भी नंगा इन्सान इसे अपने ऊपर लपेट लेता है , वह दुनिया के विद्वान और समझदार इन्सान को नंगा दिखलाई नहीं देता ....अगर किसी को वह नंगा दिखलाई देता है इसका मतलब वह इन्सान मुर्ख और देशद्रोही है ....राजा के चतुर दिमाग में एक  विचार कोंध उसने सोचा क्यों ने इसे ओढ़ कर देखा जाए , की मेरे दरबार में कितने लोग विद्वान और कितने मुर्ख है ....उसने झटपट अपने सब कपड़े उतारे और उस व्यक्ति के द्वारा लाइ हुई जालीदार चादर ओढ़ ली ...

राजा ने जब चादर ओढ़ कर खुद को आईने के आगे देखा तो उसे अपने आपको नंगा देख कर बड़ी ज़िल्लत और शर्म महसूस हुई , पर अपनी झूठी आन , बान शान और विद्वान होने भ्रम ने उसकी आँखों पर पट्टी बाँध दी और वह बड़े फक्र से नंगा ही दरबार में चला आया और बड़ी शान से बोला देखो मैंने कितनी सुंदर दैविक  राजसी वस्त्र पहने है ...राजा को नंगा देख वह व्यक्ति मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ पर उपरी दिखावे के लिए राजा की शान में झूठी तारीफ़ करते हुए बोला महारज सिर्फ एक विद्वान  ही आपके दैविक  राजसी वस्त्र को देख सकता है , जो मुर्ख और देशद्रोही है उसे आप सिर्फ चादर ओढ़े अर्ध नग्न दिखलाई देंगे ....राजा ने भी अहंकार में अपने दरबारियों से पुछा बताओ मेरे दैविक  राजसी वस्त्र कैसे है ?यूँ तो राजा के दरबार में मुर्ख , धूर्त , चाटुकार और विद्वान चारो किस्म के दरबारी और प्रजा मौजूद थे , पर राजा अपनी आत्म प्रसंशा  के मोह में इतना डूबा रहता था की उसे किसी का अपना प्रति हल्का सा भी विरोध न भाता , जो भी दरबारी उसके किसी फैसले से सहमती ना दिखाता , उसे अपने पद से हाथ धोना पड़ता या फिर उसे ऐसे किसी महत्वहीन पद पर डालकर हमेशा के लिए उसका मुंह  बंद कर दिया जाता , जहां वह अपने बीते हुए कल को याद करके सिर्फ आहे भर सकता ....

ऐसे में सिर्फ धूर्त , मक्कार और चमचों  का ही राजदरबार में बोलबाला था और इतना ही नहीं ऐसे लोगों ने जनता में भी ऐसा भ्रम फैला दिया गया था , की उनका राजा कितना प्रजा प्रेमी है और जब भी राजा कोई कठोर फैसला लेता है , वह जन हित के लिए ही होता है , ऐसे में जो धूर्त और चमचे किस्म के लोग होते वह राजा का गुण गान करके अपना कोई ना कोई फ़ायदा  किसी ना किसी तरह से उठा लेते और जो लोग राजा के फैसले की समीक्षा दिमाग से करते और राजा को उसके फैसले के विपरीत सलाह देते , उनपर राजा और उसके चमचे दरबारी देशद्रोह का मामला बनाकर उन्हें प्रताड़ित करते , ऐसे में एक  विद्वान दरबारी अपने आप को राजा के फैसले से दूर रखते और आम नागरिक सच्चाई जानते हुए भी राजा की हाँ में हाँ मिलाने में ही अपनी भलाई समझता ...सब दरबारियो और जनता को राजा सामने से पूरा नंगा नजर आ रहा था , पर किसी में इतनी हिम्मत ना थी की वह सच बोल कर राजा को बता सके की वह किसी देविक राजसी कपड़ो में नहीं लिपटा ....

राजा भी स्वंय जानता था की वह नंगा है , पर अपने को विद्वान समझने की जिद्द  ने उसे मूर्खों  का महाराज बनने पर  मज़बूर  कर दिया ....आज फिर से यही कहानी भारत के समाज में एक  बार फिर से जीवित हो गई है ......की जो हो रहा है वह कितना वाज़िब  है ...पर सच कहने की हिम्मत किसी में नहीं और जिनमे है , उन्हें राजा के धूर्त चमचे और बाकी लोग देश द्रोही या फिर कालेधन का सौदागर बताने से नहीं चुकंगे ....

यह तो बात हमने की राजा , उसके दरबारियों और प्रजा के संदर्भ में , की कई बार जल्दीबाजी में लिया गया फैसला अविवेक पूर्ण होता है या फिर उसे अमल में लाने का तरीका गलत होता है पर यह समीक्षा कौन और किसे समझाए ...अब हम चलते है एक  ऐसी कहानी की और जो आज के भारत की आर्थिक व्यवस्था को उस रूप में देखती है ....बहुत पहले की बात है ..एक  राजा था जिसका नाम चौपट था , उसके राज्य का नाम था अंधेर नगरी ....उस राजा के राज्य में एक  विचित्र आर्थिक नियम था , की उस राज्य में हर चीज टका सेर के भाव थी ...मतलब हर चीज का एक  ही भाव था , आप एक  सेर सोना ले ...तो भी टका और आप एक  किलो नमक ले तब भी टका ..या फिर आप एक  किलो मिठाई या लकड़ी कुछ भी सबका एक  ही दाम था टका सेर ...

अब सोचने में लगता है यह कैसे मुमकिन की हर चीज का एक  ही दाम हो ..कैसे नमक को सोने के बराबर , या लकड़ी को मिठाई के बराबर या बकरी और हाथी एक  ही दाम में बेचा जा सकता है ..कोई भी व्यक्ति कहेगा यह तो बिलकुल बेवकूफी भरा सिस्टम था ...पर अगर मैं कंहू की राज्य की जनता उसे बड़ा समझदारी भरा बता कर खुद को चौपट नगरी की प्रजा बोल कर गर्व का अनुभव करती थी ..तो शायद आप इसे न माने ...पर आज का भारत ऐसा ही है ...अब हर इन्सान को बैंक से बराबर पैसा मिलेगा ..चाहे वह 5 हजार रुपया कमाने वाला गंगू ठेले वाला हो या लाखों  की नौकरी करने वाला अफसर करमचंद हो ....सबको ATM ..से बराबर पैसा मिलेगा ..अब वह 100 रूपये वाला मज़दूर  हो या फिर 5 लाख रूपये का टैक्स देने वाला सेठ फकीर हो ...अब कितनी बड़ी समानता है ..की शादी में सबको सिर्फ 2.5 लाख मिलेगा ...अब यह और बात है की एक  आदमी जिसने हर साल टैक्स दिया और उसकी आमदनी सालाना 50 लाख है और उसके सिर्फ एक  संतान है और उसके विपरीत एक  ऐसा आदमी जिसके 5 संतान है और जिसकी कमाई 2 लाख सालाना है और जिसे सिर्फ शादी में 2.5 लाख खर्चने है अब उसकी शादी का बजट भी बराबर है ...तो यह हालत ऐसे ही ...की ..

अंधेर नगरी चौपट राजा टका सेर भाजी टका सेर खाजा ...


अब बात करते है लोगों की प्रतिक्रिया के ऊपर की लोग इस फैसले के समर्थन में क्यों है ...इस देश का सबसे बडा दुर्भाग्य है की यहां की आम जनता ..कभी दूसरे  को देख खुश नहीं होती , उनकी ख़ुशी अपने नुकसान से ज्यादा , पड़ोसी  , रिश्तेदारों और अपने ही दोस्तों का नुक्सान और तकलीफ देखने में होती है ..यही वज़ह  है आम आदमी अपने नुकसान और परशानी को न देख दुसरे के नुकसान में अपनी खोखली ख़ुशी ढूंड रहा है ...सबके अंदर एक  अनजाना संतोष है ...की उसके यहां  हराम की काली कमाई थी , जो डूब गई ...

यहां की जनता की सोच एक  बाल्टी में पड़े हुए केकड़े जैसी है जो इक दुसरे की टांग दबोचे पड़े रहते है ..वह ना तो खुद बहार निकलते है और न ही दूसरे  को बाल्टी से बहार निकलने देते है ....

इसकी एक  सच्ची और आँख देखी झलक , एक  सज्जन कह रहे थे ,अरे मेरा तो सिर्फ 5 हज़ार  था उसका तो मैं कुछ कर लूँगा पर पड़ोस के शर्माजी के पास  हराम का 5 लाख था वह डूब गया , उधर शर्माजी कह रहे है मेरा तो 5 लाख था , पर मेरे बड़े साहब वर्माजी तो खूब मोटा माल जमा करके बैठे है उनका 5 करोड़  था वह गया बट्टे खाते , मेरे 5 तो दो चार फर्जी कम्पनी के खातों  में खप जायंगे ...उधर वर्माजी कह रहे है मेरा क्या सिर्फ 5 पेटी , 3 तो पहले ही खपा दी , बची 2 उनका भी बैंक मेनेजर से 20% पर  काम हो जाएगा ..पर यह हमारे निगम का अध्यक्ष क्या करेगा , जिसके 500 पेटी है और अध्यक्ष कह रहा है मेरा क्या विधायक पर  ज्यादा है , विधायक कह रहा है मेरे पर  क्या सांसद पर  मुझसे ज्यादा है और संसद कह रहा है , अरे मुझे क्या फ़िक्र मैंने  तो पहले ही सारा माल ठिकाने लगा कर डॉलर में बदल लिया , बांकी को सोने और दूसरी बेनामी सम्पति में लगा दिया , सोचे तो वह लाला , जो काश में खेलते है और काश वाला लाला , हंस रहा है , अरे इतनी पेटी और खोखे तो कब के निबटा दिए ....सच तो यह ,जनता एक दूसरे  के नुकसान में अपनी झूठी ख़ुशी देख रही है ....खुद कितने परेशान  है उससे मतलब नहीं , पर दूसरा इनसे ज्यादा तकलीफ में है इसकी उन्हें ख़ुशी है ... 

सच बात यह है सरकार ने जो भी फैसला लिया उससे किसी को आपत्ति नहीं ..पर फैसला लेते वक़्त आने वाली समस्याओं  ना समझना और उनके सही विकल्प ना देना ही सबसे बड़ी मुर्खता और हठधर्मिता है ..सवाल यह है ..की इसके बाद क्या काला धन नहीं होगा ? क्या आतंकवाद नहीं होगा ? और सबसे बड़ी बात आपने इन सबको रोकने के लिए क्या कदम उठाये उसकी क्या तस्वीर है , यह भी तो जनता को समझा दीजिये ..आप अपनी जिम्मेदारी से भाग कर , अपनी गलती को जनता के गले डाल कर उसे झूठी देश भक्ति का लॉलीपॉप  दे रहे है .............

कोई सरकार से यह पूछे की नकली करेंसी छपती क्यों और कैसे है , आप उसकी रोकथाम के लिए अब क्या नया करेंगें  की आगे ऐसा ना हो , क्या आतंकवाद सिर्फ नकली नोटों से चलता है , काले धन की परिभाषा क्या है , कल तक स्विस बैंक वाला धन काला था , आज घर में रखा धन काला हो गया ?जिन्होंने यह गुनाह किया , आपने उनके खिलाफ क्या किया और कितने लोगो को पकड़ा , सिर्फ नोट बंद कर देने से यह समस्या वक्ती तौर पर  हल हो जाएगी ,पर कल क्या होगा ?...

अब यह फैसला अच्छा है या बुरा ,इसे कहने के लिए तो बहुत बातें  है ...पर मेरा सिर्फ एक  सवाल , अगर यह फैसला अमेरिका या किसी यूरोप के देश में होता तो , आप देखते की लाइन में नेता , अभिनेता और सारे प्रसिद्ध लोग लाइन में लगकर अपने अपने नोट जमा करवाते या बदलवाते ... ...और ऐसा करके देश के कानून का सम्मान करके खुद को भी गर्व से देश का एक  आम नागरिक कहते ...क्या आपने अभी तक एक  भी नेता (चाहे विधान सभा या लोक सभा या निगम ) के वर्तमान या पूर्व नेता , खिलाडी , फिल्म स्टार या किसी भी अमीर या थोड़े से प्रसिद्ध आदमी को लाइन में लग कर नोट जमा करवाते या बदलवाते देखा है ? अगर हाँ तो जरा पब्लिक से शेयर करे ...अगर अभी तक ऐसा आपने नहीं देखा तो आप अपने आप से पूछे , की क्या इन लोगो को अपने नोट नहीं बदलवाने या इनके पास ऐसे कोई नोट नहीं है ..अगर है तो इन्होने अपने नोट किससे और कैसे बदलवाए ? अगर बदलवाए तो कैसे ?जबकि नोट बदलवाने के लिए आप को खुद अपने सर्टिफिकेट के साथ बैंक के पास जाना होता है .....दूसरे  के आधार या पेन कार्ड का इस्तमाल करके नोट बदलवाना कितना उचित है ?क्या दुसरो से नोट बदलवाना या अपने जानपहचान के बैंक मेनेजर से पीछे से काम करवाना , फिर मीडिया में भाषण देना कितना उचित है ?

क्या ऐसे दोगले लोगो से आप देश में काल धन और भ्रष्टाचार  खत्म करने का सपना संजो रहे है ?कृपया जज़्बात से ज्यादा दिमाग का इस्तमाल करे और सोचे क्या कोई एक  भी अहम आदमी इस देश के लॉ एंड आर्डर को मानता है ? ऐसे में एक  स्वच्छ , साफ़ सुथरे , काला धन और भ्रष्टाचार  से मुक्त भारत का सपना ...सिर्फ सपना है ...जब यह लोग अपना इतना सा काम आम इन्सान की तरह तक नहीं कर सकते ..तो और क्या करते होंगे ....आगे आप समझदार है ....

By 
Kapil Kumar 

Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely coincidental.' ”

Sunday, 11 December 2016

मैं क्यों तड़पता हूँ ?


जो कभी ना
करती है मुझे दिल से याद 
जिसे कभी ना
सुनाई देती है मेरी फ़रियाद 
जिसे कभी करीब
से देखा ही नहीं 
ऐसे पत्थर की
मैं क्यों पूजा करता हूँ 
फिर ऐसे हरज़ाई
के लिए , मैं क्यों तडपता हूँ ?

मैं रात भर
जागूं या दिन भर रहूँ बैचैन 
बिस्तर पे
करवट बदलू या खो दूँ अपना चैन 
यूँ भटकूँ
अनज़ान राहों पर या पथरा दूँ अपने नैन 
उसे नहीं है
फ़िक्र मेरी की दे कुछ अपनी भी रैन
फिर ऐसे बेदर्द 
के लिए , मैं क्यों तडपता हूँ ? 


जिसमें अकड़  है इतनी की ऐंठन भी शर्मा जाये 
उसका दिल है इतना कठोर की पत्थर भी नर्म पड़ जाए 
उसके संकल्प के आगे तो अंगद भी हिल जाए 
जिसे कभी हुई ही ना मोहब्बत 
फिर ऐसी जोगन के लिए , मैं क्यों तड़पता  हूँ ? 

By 
Kapil Kumar 

Sunday, 4 December 2016

ख़ामोश आँखें .......




तेरी आँखों की ख़ामोशीयां जैसे करती है मुझसे कुछ सवाल 
इनमे छुपा  है कितना प्यार , फिर भी मांगते हो मुझसे इक़रार ...........


तेरे सूखते होठ जैसे देते है मेरी हर बात का जवाब 
जब तक तुम इन्हें ना चूमोगे , यह कैसे होंगे लाज़वाब ..............


तेरे भरे हुए कपोलों की सुर्खिया , मुझे मांगती है यह
कैसा हिसाब
जब तक तुम इन्हें ना छुओगे , फिर यह कैसे रहेंगें  सुर्ख लाल ..............


तेरी लहराती जुल्फों की लटाओं को मैं
क्या दूँ जवाब 
जो बिखरी है मेरे इंतजार में , बनके एक  महकता शबाब .............


तेरे चेहरे की मुस्कान जैसे करती एक अनजाना  सा अहसान 
मेरी वफ़ा को तोलने वाले , कभी तू भी तो हो मुझपर  कुर्बान .............


तेरी आँखों का कजरारा , जिसने मुझे देखा और धिक्कारा 
हे भटकने वाले मुसाफिर , क्यों
ढूंढता  है तू कोई और सहारा ..............

तेरे माथे का लश्कारा , जैसे देता है मुझे कोई आवाज़ 
जिसकी फीकी पड़ती चमक , जैसे कहती है अब तो कर लो मेरा आगाज़ .......

By
Kapil Kumar