Saturday, 14 November 2015

उसे .... इक बार तो बुलाओ ......


मेरे इन आंसुओ की, कुछ कीमत तो लगाओ ... मेरे इन आंसुओ की, कुछ कीमत तो लगाओ ... वोह दिन रात बहते है जिसके लिए .... उसे इक बार , मेरे पास तो बुलाओ ... मेरे इन आंसुओ की, कुछ कीमत तो लगाओ ...


मेरे टूटे दिल के टुकड़े , यूँ जमींन पे ना फैलाओ.... बहुत नाजुक है पावं उसके , वोह उनसे कंही छिल ना जाए .... उन्हें उसके पावं के निचे से हटाओ ...... मेरे टूटे दिल के टुकड़े , यूँ जमींन पे ना फैलाओ....  


मेरे बिखरे सपनो को , यूँ फिर से सजाओ .... सोती है वोह गहरी नींद में .... उसे , उन्हें जी भरके दिखाओ ... मेरे बिखरे सपनो को....


मेरे दर्द के किस्से , खुलेआम यूँ मत सुनाओ .... झूम रही है अभी वोह , उमंगो की तरंग में .... उसे भूले से भी मत रुलाओ ..... मेरे दर्द के किस्से....
मेरे जीवन के पतझड़ को , उससे दूर कंही ले जाओ


.... वोह नाच रही है सावन के मौसम में ..... उसकी जीवन की महकती बगिया को , मुझ जैसे पतझड़ से बचाओ ...


मेरी नाकाम मोहब्बत के अफसाने ,उसे मत सुनाओ .... अभी भी खिली हुई है , उसकी जवानी .. उसकी बहार को , यूँ मत रुलाओ... मेरे इन आंसुओ की, कुछ कीमत तो लगाओ .....


By
Kapil Kumar 

Post a Comment